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Friday, April 29, 2016

"मेरे लिए मृत्युश्लोक मत पढ़ना"

शायद मेरे तेवर कुछ अलग होंगे 
शायद मेरी आवाज़ भी कड़ी होगी 
शायद मैं वो श्लोक नहीं सुन पाऊँगा 
जो ठीक मरने के पहले सुनाया जाता है 
शायद मैं उस भगवान् का नाम भी न ले पाऊँगा 
जिसे, मुझे मानना सिखाया गया है।  


ऐसा नहीं है कि मैं 
भीड़ की तरफ़ नहीं देखूँगा 
उस नपुंसक भीड़ की तरह
जो नियोग विधि से 
छन भर में जनम कर सुरसा हो जाती है। 


मैं कोई क़वायद नहीं हूँ 
न ही कोई फरयादी हूँ 
जिनके लिए मौन एक संस्कार है 
सजदा एक धर्म है,
मैं किसी के लिए नहीं लिखता 
न दाम के लिए, न वाम के लिए 
मेरी जगह बस्तियों और महफ़िलों में नहीं है 
जहाँ मुर्दे अपनी अपने ख़्वाबों को नज़रबन्द कर 
ख़्वाबों पर ही कवितायेँ सुनाते हैं। 


मेरे ठीक मरने के पहले सबको हक़ है 
कि वो मेरी लाश के पास आयें 
ऐसा चेहरा लिए मानो वो मुझे 
पहचानते भी हैं और नहीं भी पहचानते हैं
अगर सांस बाक़ी रही 
तो मैं भी उन्हें देख कर 
व्यंग्य से हसुँगा 
और आवाज़ निकल पायी तो कहुँगा 
कि देखो, हाँ देख लो 
कि मेरा एक हाथ उस सुराख़ पर है 
जिसमे अभी अभी  
अपनी कुंठा निकलने के लिए 
भीड़ ने बन्दूक से हस्तमैथुन किया है 
और मेरा दूसरा हाथ उस कलम पर है 
जिससे मैं हमेशा मौत की कविता 
ज़िन्दगी की स्याही से लिखता आया हूँ। 

"निर्मल अगस्त्य"
01:04 PM, 29/04/2016
पटना, बिहार। 

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