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Sunday, September 12, 2010

फ़ासला


ओ आसमान!


शुक्रिया ------!


ज़रा बोल तो सही ऐसे कैसे लिखी तूने


फ़ासले की स्याही से तकदीर मेरी


इतनी अफ्राज़ीद इतनी सब्ज़।


फ़ासलों ने


मेरी ज़िन्दगी को दिया है


रूमानियत की बेपनाही


और ख़्वाबों की महबूबियत,


फ़ासला जो उम्र का है


सो पाने की गुन्जायिश कहाँ


तो खोने का डर नहीं


ये दूरी ही मुझे जिंदा रखती है।


फ़ासला, जो मेरी ज़ुबां


और तेरी इक निगाह की खातिर


दिल से निकली सदाओं में है


वो मुझे कविता देती है


फ़ासला, जो तेरी बेईन्तिहाई


और मेरी मख्मूर आवारगी में है


वो मुझे रौशनी देती है;


ज़िन्दगी......


मोहब्बत...........


उसपे तेरी मोहब्बत...........


ओ आसमान! तेरा बेहिसाब शुक्रिया.

Saturday, September 11, 2010

राग-दीवार की बंदिश



दीवारों के पास
लगभग सभी तरह के
संवेदना के तत्त्व मौजूद हैं;
वे देखती हैं-
कलम और पन्नों के
भीतर बजते आलाप के जोड़-तोड़ को,
वे सुनती हैं-
बड़े चाव से
मेरी तन्हाई के संधिप्रकाश रागों को,
वे महसूस करती हैं-
मेरे हृदय से गमक के साथ फूटते
अकेलेपन के स्पंदन को,
वे सुनती हैं-
मेरी ख़ामोशी में
कण की तरह छू कर
वादी बने बैठे बेचैनी पर
उतर आये तड़प के जमजमे को,
वे सूंघती हैं-
मेरे मन में पक रहे
फतांसी और रोमांस को:
बड़ी नयी बात है की
जब मैं जागता रहता हूँ
शुक्र-तारे को ऊंघते देख-देख,
दीवारें और भी क़रीब चली आती हैं
जैसे उमड़ती सी नींद;
यह कोई अक्स
या ख़्वाब की मौशिकी सी है
कि अब मेरी आँखों में ही
------सोने लगी हैं दीवारें.

Thursday, September 9, 2010

फ़ैसला


तुमसे प्रेम करने का अभियोग
हो जाएगा इतना घना
कि छोटी पड़ जायेंगी
सारी क्रूरतम सज़ाएं!
मेरी ख़ुशी से बेचैन
और मेरे अहंकार से छुब्ध
भाग्य का निर्मम न्यायाधीश
फ़लक कि मेज़ पर
दिल-ये-सदचाक कि हथौड़ी पटकता
सुनाएगा फ़ैसला----
वियोग....वियोग.....वियोग......

Wednesday, August 18, 2010

इसी कुछ में

कुछ रास्ते.....
हमेशा घास के भीतर ही रह जायेंगे
कुछ रिश्ते.......
बिना बात के निभते चले जायेंगे,
कुछ पन्ने.......
हमेशा ही कोरे रह जायेंगे,
कुछ कवितायें.......
कभी नहीं पढ़ी जायेंगी.
इसी कुछ में
कई ज़ाती जिंदगानी दराज़ होंगी
जहाँ कुछ बातें.......
हमेशा बचकानी रह जायेंगी.

Wednesday, August 11, 2010

वो दुनियां अगर

वो दुनियां विश्लेषण की कैंची से परे
तर्क के सैंड पेपर से दूर हम खड़े
जो था बस कल्पना थी .....मन था......सपने थे.....

जहां परियां थीं
बोतल में बंद जिन्न था
भूत, पिशाच बिजूका
और झाडू पर उड़ने वाली चुडैलें थीं
बचपन की वो दुनियां
जो पीछे छूट गयी
कहानियों वाली दुनियां
कॉमिक्स वाली दुनियां
रेडियो और अखबारों वाली दुनियां ......

वो गुड्डे-गुडिया की शादी की दुनियां
वो परियों की कहानियों की दुनियां
वो शरबत की दुनियां
जिसके लिए नींबू चुराए थे हमने
वो पहली पहली बार पिकनिक की दुनियां
जिसमे चूल्हे जलाए थे हमने
वो पूड़ी जो कच्ची भी-पक्की भी प्यारी थीं
वो सब्जी जो हम मिनटों में चट कर जाते थे
फिर बर्तनों से टन-टन लड़ाई की दुनियां
वो मीठे मोहब्बत के झगड़ों की दुनियां ..........

वो काग़ज़ की बंदूकों से धिच्क्यों का खेला
वो दुर्गाबाड़ी के चैती दुर्गा का मेला
उस मेले में संवरकी के बेर की चटनी
खिचड़ी के परसाद के लाइन का रेला
वो पानी के मूछों की दुनिया
वो मूंछों में सनसनाती पानी की दुनियां
वो दुनिया तुम्हारी थी वो दुनिया थी मेरी
कहाँ छोड़ आये चक्कलस की दुनियां ......

Thursday, July 29, 2010

दुःख का संविधान

दुःख का

एक अपना ही संविधान है

जिसमे न जाने

कितनी जटिल धाराएँ हैं

और यहाँ

संशोधन की गुंजाईश

कतई नहीं है

बस संशोधनों के नाम पर

दुःख..........

एक नए कलेवर में पेश होता है

हालाँकि,

सभी इस कोशिश में हैं कि

संशोधनों के

सुखद परिणाम निकल सकें

लेकिन , दूसरी मुश्किल ये भी है कि

मेरे हिस्से के सुखों के

पास जीवन के संसद

में प्रवेश की पात्रता ही नहीं है।

Wednesday, July 28, 2010

राह पे रहते हैं

रास्ते मुझे बेहद पसंद हैं
हर आहट के नीचे
एक नयी कहानी के आभास का
आसरा मिलता है ;

कभी यूँ ही बिना किसी पूर्वसूचना के
अनायास ही कोई साथ हो लेता है
और कुछ कदम चलने के बाद
किसी मोड़ पे घूम कर
अपनी राह चला जाता है
एक खूबसूरत एहसास छोड़ ;
मंजिल पर बहुत मुश्किल है
किसी के अलगाव को
राह में मिले
हमसफ़र के अलगाव की तरह भूल जाना ;

मैं किसी ऐसी मंजिल पर
जाना ही नहीं चाहता
बस कुछ ढूंढना चाहता हूँ
राहों पे लगातार भटकते हुए ।