तुमसे प्रेम करने का अभियोग
हो जाएगा इतना घना
कि छोटी पड़ जायेंगी
सारी क्रूरतम सज़ाएं!
मेरी ख़ुशी से बेचैन
और मेरे अहंकार से छुब्ध
भाग्य का निर्मम न्यायाधीश
फ़लक कि मेज़ पर
दिल-ये-सदचाक कि हथौड़ी पटकता
सुनाएगा फ़ैसला----
वियोग....वियोग.....वियोग......
दुःख का
एक अपना ही संविधान है
जिसमे न जाने
कितनी जटिल धाराएँ हैं
और यहाँ
संशोधन की गुंजाईश
कतई नहीं है
बस संशोधनों के नाम पर
दुःख..........
एक नए कलेवर में पेश होता है
हालाँकि,
सभी इस कोशिश में हैं कि
संशोधनों के
सुखद परिणाम निकल सकें
लेकिन , दूसरी मुश्किल ये भी है कि
मेरे हिस्से के सुखों के
पास जीवन के संसद
में प्रवेश की पात्रता ही नहीं है।