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Thursday, September 9, 2010

फ़ैसला


तुमसे प्रेम करने का अभियोग
हो जाएगा इतना घना
कि छोटी पड़ जायेंगी
सारी क्रूरतम सज़ाएं!
मेरी ख़ुशी से बेचैन
और मेरे अहंकार से छुब्ध
भाग्य का निर्मम न्यायाधीश
फ़लक कि मेज़ पर
दिल-ये-सदचाक कि हथौड़ी पटकता
सुनाएगा फ़ैसला----
वियोग....वियोग.....वियोग......

Wednesday, August 18, 2010

इसी कुछ में

कुछ रास्ते.....
हमेशा घास के भीतर ही रह जायेंगे
कुछ रिश्ते.......
बिना बात के निभते चले जायेंगे,
कुछ पन्ने.......
हमेशा ही कोरे रह जायेंगे,
कुछ कवितायें.......
कभी नहीं पढ़ी जायेंगी.
इसी कुछ में
कई ज़ाती जिंदगानी दराज़ होंगी
जहाँ कुछ बातें.......
हमेशा बचकानी रह जायेंगी.

Wednesday, August 11, 2010

वो दुनियां अगर

वो दुनियां विश्लेषण की कैंची से परे
तर्क के सैंड पेपर से दूर हम खड़े
जो था बस कल्पना थी .....मन था......सपने थे.....

जहां परियां थीं
बोतल में बंद जिन्न था
भूत, पिशाच बिजूका
और झाडू पर उड़ने वाली चुडैलें थीं
बचपन की वो दुनियां
जो पीछे छूट गयी
कहानियों वाली दुनियां
कॉमिक्स वाली दुनियां
रेडियो और अखबारों वाली दुनियां ......

वो गुड्डे-गुडिया की शादी की दुनियां
वो परियों की कहानियों की दुनियां
वो शरबत की दुनियां
जिसके लिए नींबू चुराए थे हमने
वो पहली पहली बार पिकनिक की दुनियां
जिसमे चूल्हे जलाए थे हमने
वो पूड़ी जो कच्ची भी-पक्की भी प्यारी थीं
वो सब्जी जो हम मिनटों में चट कर जाते थे
फिर बर्तनों से टन-टन लड़ाई की दुनियां
वो मीठे मोहब्बत के झगड़ों की दुनियां ..........

वो काग़ज़ की बंदूकों से धिच्क्यों का खेला
वो दुर्गाबाड़ी के चैती दुर्गा का मेला
उस मेले में संवरकी के बेर की चटनी
खिचड़ी के परसाद के लाइन का रेला
वो पानी के मूछों की दुनिया
वो मूंछों में सनसनाती पानी की दुनियां
वो दुनिया तुम्हारी थी वो दुनिया थी मेरी
कहाँ छोड़ आये चक्कलस की दुनियां ......

Thursday, July 29, 2010

दुःख का संविधान

दुःख का

एक अपना ही संविधान है

जिसमे न जाने

कितनी जटिल धाराएँ हैं

और यहाँ

संशोधन की गुंजाईश

कतई नहीं है

बस संशोधनों के नाम पर

दुःख..........

एक नए कलेवर में पेश होता है

हालाँकि,

सभी इस कोशिश में हैं कि

संशोधनों के

सुखद परिणाम निकल सकें

लेकिन , दूसरी मुश्किल ये भी है कि

मेरे हिस्से के सुखों के

पास जीवन के संसद

में प्रवेश की पात्रता ही नहीं है।

Wednesday, July 28, 2010

राह पे रहते हैं

रास्ते मुझे बेहद पसंद हैं
हर आहट के नीचे
एक नयी कहानी के आभास का
आसरा मिलता है ;

कभी यूँ ही बिना किसी पूर्वसूचना के
अनायास ही कोई साथ हो लेता है
और कुछ कदम चलने के बाद
किसी मोड़ पे घूम कर
अपनी राह चला जाता है
एक खूबसूरत एहसास छोड़ ;
मंजिल पर बहुत मुश्किल है
किसी के अलगाव को
राह में मिले
हमसफ़र के अलगाव की तरह भूल जाना ;

मैं किसी ऐसी मंजिल पर
जाना ही नहीं चाहता
बस कुछ ढूंढना चाहता हूँ
राहों पे लगातार भटकते हुए ।

Wednesday, June 23, 2010

"विक्रम और वेताल कभी नहीं मरते"

स्वीकार करने की सुविधा
मेरे भीतर छुपे प्रेत को है,
आकांक्षा का प्रेत.

जो हर बार
किसी डरावनी सी शक्ल वाली
ठूँठ से कूद कर
मेरे कन्धों पर
जम कर बैठ जाता है,

क्यूंकि , इनकार करने का अधिकार
मुझे प्राप्त नहीं है
और स्वीकार करने की सुविधा
मेरे भीतर छुपे प्रेत को है,
प्रश्न करना उसका शगल है
और उत्तर देने में
मौन का टूटना मेरी नियति
सापेक्ष है ये सम्बन्ध, सार्वभौम सत्य !
निरपेक्ष है
उस प्रेत की जटिलता।
पारदर्शिता के वावजूद भी
उसे छूना संभव नहीं
जैसे सपनों को बोना।

एक तहज़ीब के तहत मैं मनुष्य हूँ
और एक मिथक की तरह वो प्रेत है,
मेरे कन्धों पर सवार
प्रश्न पूछता लगातार

मौन-हन्ता मैं बार-बार.

Monday, February 15, 2010

ANONYMOUS

Those streets were calm and adorable
Who had no name,
The just born was so heavenly
Before he was baptized.

Morning dew had crazy diamonds
Before we stared to them,
There were no milestones
And the path was untiring.

Those melodies were endearing for the soul
Who, didn’t come out of score-sheets,
Woods were tranquil and peaceful
Before we approached to them.


God was omnipotent
Before we bothered him to be praised,
And love was crystal pure
Before we possessed.

Some bonds were spiritual,
Before we touched them to acclaim!