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Wednesday, August 3, 2011
Tuesday, July 26, 2011
"उन ख़्वाबों को कहाँ सजाऊँ"
जाने.... कैसे......
ख़्वाबों की जगह बनाऊँ,
टूटे...... कुछ छूटे........
उन ख़्वाबों को कहाँ सजाऊँ,
उन गलिओं का न कोई पता
उन रिश्तों में न अब है सदा
उन ज़ख्मों की अब न दवा
जो छू के आये हम.
जाने.... कैसे......
ख़्वाबों की जगह बनाऊँ,
टूटे...... कुछ छूटे........
उन ख़्वाबों को कहाँ सजाऊँ.
मिलते-मिलते जो मिल जाते हैं
वो ख़्वाब कहे जाते हैं,
मिल के भी जो न मिल पाते हैं
वो भी ख़्वाब कहे जाते हैं.
काश के मिलसे उनसे कह पाते हम
ख़्वाब की कहानियाँ उनकी कुछ निशानियाँ.
जाने.... कैसे......
ख़्वाबों की जगह बनाऊँ,
टूटे...... कुछ छूटे........
उन ख़्वाबों को कहाँ सजाऊँ,
उन गलिओं का न कोई पता
उन रिश्तों में न अब है सदा
उन ज़ख्मों की अब न दवा
जो छू के आये हम.
जाने.... कैसे......
ख़्वाबों की जगह बनाऊँ,
टूटे...... कुछ छूटे........
उन ख़्वाबों को कहाँ सजाऊँ.
Sunday, February 13, 2011
तुम कहती हो तो
तुम कहती हो तो
चलो .. तुम कहती हो
तो गिन लेता हूँ
लेकिन मेरी मानो तो...
कल ये जितने थे
और कल जितने रहेंगे
आज भी उतने ही हैं ….
फिर भी तुम कहती हो
तो गिन लेता हूँ …
अच्छा एक बात बताना
कि उस रोज़
जब तुम मिली थी
तो बार-बार मेरे पीछे
उसे देख रही थी
जो सहमा सा
मेरी पीठ के पीछे
ज़मीन पर पड़ा था ..
वो तो मेरे पीछे
हमेशा ही होता है
जब सुबह आगे होती है
और कभी आगे-आगे
जब पीछे शाम हो रही होती है .
ये उसके और मेरे बीच
छाँव -धूप का
कभी नहीं ख़त्म होने वाला खेल है ..
अब शाम ढलने के बाद
फ़िर एक खेल ..
लेकिन कोई बात नहीं
तुम कहती हो तो
गिन लेता हूँ ..
लेकिन मेरी मानो
तो कल ये जितने थे
और कल जितने रहेंगे
आज भी उतने ही हैं ….
अच्छा चलो मान लो
कि मैंने गिन लिया
तो बताओ उस गिनती का
तुम क्या करोगी ..
फ़िर दुनिया आ जायेगी ..
समाज जमा हो जाएगा ..
नहीं एक कम रह गया..
नहीं एक ज्यादा लग रहा है शायद ..
तुम फ़िर कहोगी- अरे कैसे !
तुमने उनकी टिमटिमाहट पे
निशान नहीं लगाया होगा शायद ..
निशान लगा के रखते
तो गिनती में ग़लती ना होती ..
अब क्या बताऊँ
कि हर रोज़ जब
तुम्हारे जाने के बाद
मैं दफ़्न हो जाता हूँ
तो मेरा दिल
सीने से निकल कर
उफ़क में चला जाता है ..
तुम्हें जाते हुए देखने के लिए
और जब तुम आ जाती हो तो ….
एक कम या एक ज्यादा ..
ये सवाल नहीं
तुम्हारे पीछे खड़ी
दुनियावी सियासत की क़ायनात है
जो मोहब्बत के ज़ज्बात को
गिनने को ख़ुदाई समझती है ..
फ़िर भी,
तुम कहती हो तो
गिन लेता हूँ ..
लेकिन मेरी मानो
तो कल ये जितने थे
और कल जितने रहेंगे
आज भी उतने ही हैं ….
Thursday, December 9, 2010
बीच रास्ते में
कभी-कभी बिना किसी पूर्वाग्रह के हम
सड़क के ठीक बीचो-बीच चल रहे होते हैं!
ये बात और है कि
इसकी वजह बेफ़िक्री भी हो सकती है
या कोई ग़ुमनाम नाराज़गी भी,
जो हम अक्सर बोलते-बोलते रह जाते हैं.
और पीछे अचंभित किसी गाड़ी के
अनवरत हार्न को अचानक से सुनने के बाद
हम मुड़ कर ऐसे देखते हैं
जैसे कि हम वराह की तरह
दाँतों पर पृथ्वी रख कर लौट रहे हैं
या सर पर हमने ब्रह्माण्ड उठा रखा है.
फ़िर हम रास्ता दे भी देते हैं--
सकपका कर या ज़बरदस्ती की
शर्मिन्दगी ओढ़ कर,
कुछ पलों के लिए ब्रह्माण्ड को
किसे जेब के हवाले करते हुए.
फ़िर रास्ते भर भुनभुनाते, बुदबुदाते,
कि काश!
पास भी एक तुरही होती
जो हम उस गाड़ी-चालक के
कानों के पास जा के बेरहमी से फूँक पाते,
कोई जड़ी या जादू की छड़ी होती हमारे पास
जो गाड़ी को एक खिलौने में बदल देता.
सोने-सोने तक हम
उस ब्रह्माण्ड की तरफ़ देख,
अपनी व्यस्तता स्थापित करने में लगे रहते हैं,
जो कायदन हमें
अपने अपने कार्यस्थलों पर ही छोड़ आना चाहिए था.
फ़िर हम सो ही जाते हैं---
कल्पना में गाड़ी हाँकते हुए,
उन रास्तों पर हवा से बातें करते हुए
जहाँ हमारी तरह कोई आदमी
ब्रह्माण्ड सर पर लादे
बीच रास्ते में न चला जा रहा हो.
सड़क के ठीक बीचो-बीच चल रहे होते हैं!
ये बात और है कि
इसकी वजह बेफ़िक्री भी हो सकती है
या कोई ग़ुमनाम नाराज़गी भी,
जो हम अक्सर बोलते-बोलते रह जाते हैं.
और पीछे अचंभित किसी गाड़ी के
अनवरत हार्न को अचानक से सुनने के बाद
हम मुड़ कर ऐसे देखते हैं
जैसे कि हम वराह की तरह
दाँतों पर पृथ्वी रख कर लौट रहे हैं
या सर पर हमने ब्रह्माण्ड उठा रखा है.
फ़िर हम रास्ता दे भी देते हैं--
सकपका कर या ज़बरदस्ती की
शर्मिन्दगी ओढ़ कर,
कुछ पलों के लिए ब्रह्माण्ड को
किसे जेब के हवाले करते हुए.
फ़िर रास्ते भर भुनभुनाते, बुदबुदाते,
कि काश!
पास भी एक तुरही होती
जो हम उस गाड़ी-चालक के
कानों के पास जा के बेरहमी से फूँक पाते,
कोई जड़ी या जादू की छड़ी होती हमारे पास
जो गाड़ी को एक खिलौने में बदल देता.
सोने-सोने तक हम
उस ब्रह्माण्ड की तरफ़ देख,
अपनी व्यस्तता स्थापित करने में लगे रहते हैं,
जो कायदन हमें
अपने अपने कार्यस्थलों पर ही छोड़ आना चाहिए था.
फ़िर हम सो ही जाते हैं---
कल्पना में गाड़ी हाँकते हुए,
उन रास्तों पर हवा से बातें करते हुए
जहाँ हमारी तरह कोई आदमी
ब्रह्माण्ड सर पर लादे
बीच रास्ते में न चला जा रहा हो.
Sunday, December 5, 2010
कहीं कोई खिड़की
जब पुराने शहर से कुछ पुराने लोग
मिलने आ जाते हैं तो बरसों से जाम पड़ी कोई खिड़की
दिखने में दुसह, दुर्वार!
पता नहीं कैसे हलके से छू देने से ही
बिना चरमराये, चुपचाप खुल जाती है
कि जैसे कभी बंद ही न हुई हो.
जो हुआ अच्छा हुआ और ये जो है-
टटका-टटका, ताज़ा-ताज़ा, रोज़मर्रे में टनमनाया,
ये भी कोई ख़ास बुरा नहीं है.
तब पुराने शहर के पुराने लोग
चाय की चुस्किओं के बीच से बचाकर रखी गयी
मुस्कुराहट के साथ बताने लगते हैं कि
यही कोई चार रोज़ पहले उधर भी एक खिड़की
ऐसे ही हलके से छू देने से खुली थी
और उसने भी ऐसा ही कुछ कहा था
कि कुछ विशेष बोझिल नहीं है जीवन
जबकि घृणा और संताप को खपाने के लिए
नए और दैनन्दिनी में कुनमुनाते मसले,
ज़्यादा अच्छा इमोशनल कारोबार दे रहे हैं.
हालांकि, वो भी अच्छा ही था,
रोमांच से भर देने वाला
लेकिन अब उत्तरदायित्वों के सिलसिले
मोहब्बत की फतांसी से कम मासूम तो नहीं ही हैं.
तुम भी मुस्कुराते हो, बात बदलते हो,
कि प्लेट में बिस्किट भी हैं जो न मीठे हैं न नमकीन.
और उसमे लेमन ग्रास की खुशबू सी थी
जो बार-बार डब्बा खुलने की वज़ह से अब नहीं रही.
जिसे तुमने किसी आते हुए दोस्त को बोलकर
पुणे के किसी बेकरी से मंगाई थी,
जहाँ पिछले साल दो लोगों को तंदूर में भुन दिया गया था.
पुराने शहर के पुराने लोग जानते हैं
कि जो खिड़की अभी-अभी खुली है
वो शहर पुणे तो नहीं ही है.
फ़िर बात- पुणे, बेकरी, आग, आटा, तपन
और लेमन ग्रास के सिग्नलों से होते हुए
बच्चे, स्कूल, बजट, तंदूर, दवाई और परहेज़ के स्टेशनों पर
दम भर रूकती-सरकती, विदा के हाथ हिलने तक
धडा-धड, धडा-धड चली जाती है,
और पुराने शहर के पुराने लोगों के जाने के उपरांत
कहीं कोई खिड़की नहीं होती.
बस उनके बंद होने की चरमराहट,
जो खुलते वक़्त तो नहीं थी,
शेष रह जाती है.
Monday, November 29, 2010
इसे भी गुज़र जाने दो
आशाओं से लदा-फदा
और नए मौज के चक्के पर आ ही गया है!
आज भी सूरज ने कमोबेश
उतनी ही रोशनी छोड़ी है निर्वात की सुरंगों में.
हवा कुछ तेज़ी है और बादल कहीं-कहीं
गढ़बंधन की जैसी कोशिशों में मशगूल हैं.
लतीफ़ों के क्रमांक बदले से तो लग रहे हैं,
ठहाकों का लगभग-लगभग वही है.
खेतों से विदा ले कर आज भी उतनी हीसब्जिया
झूलती मटकती झोलों में सवार होकर
अलग-अलग गंतव्यों की ओर चल चुकीं हैं.
फूलों की खुशबू हालाँकि अब थोड़ी दूर निकल तो गयी हैं
और अब यहाँ पके हुए धान की महक है
लेकिन ये तो तय है की वे कहीं न कहीं से आयीं तो ज़रूर थीं.
कोई आधे, पाव किलो बेलग्रामी, गाजे में
अपने-अपने हिसाब से सासाराम, रोहतास और हसन बाज़ार को
हर डब्बे ने इतिहास की चिंता से मुक्त होकर सहेज लिया है.
इशारों से लदा-फदा और कनखियों का बोनट टाँगे
वो बढ़ता जा रहा है आज भी
एक नए आवरण में लिपट कर.
जिसपर शुभकामनाओं का स्टिकर,
कजरारी चमक के दिठौने में सुरक्षित है.
अब आ ही गया है तो पूरी बारात आ जाने दो.
अच्छे मेजबान का सख्त अभाव है आजकल!
बिठाना, खिलाना, बतियाना न सही,
हम भी तो अपने दोस्त की दुल्हन विदा कराने आये हैं
तो इस सोमवार को भी ज़रा शान से
दिन की दुल्हन ले के खुशी-खुशी गुज़र जाने दो.
Friday, October 15, 2010
और क्या ?
१
दिल एक समंदर है
जहाँ हर रोज़
मन से निकल
कई नदियाँ समा जाती हैं.
न तो समंदर कभी भरता है
न ही नदियों का
उदगम कभी थमता है.
बस कभी-कभी कुछ पल
ज़िंदगी के मौसम को
जेठ लग जाता है
और रेत के कुछ
बेज़ार टीले दिखाई पड़ जाते हैं.
2
बहुत लंबे समय तक
कोई एक ख़ास पल
अटक सा जाता है,
जैसे ग्रामोफ़ोन की सुई.
और अचानक
उछल कर चला जाता है
गीत के मध्य कहीं.
कमबख्त !
बीच की दो चार पंक्तियाँ
जो गाया न जा सका,
मेरे सुनने के लिए छोड़ जाता है.
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