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Friday, August 18, 2023

 

हार जाना

(1)

हार जाना
सालता है,
लेकिन  मुक्त करता है
तुलना और द्वंद से,
जो जीत के साथ-साथ
शमसान तक चलता है!

 



(2)

हार जाना
सुन्दर होने जैसा नहीं होता
ना ही होता है
कि यही हुआ तो क्या हुआ,
ना ये कि बहुतों को
हारना पड़ता है
कुछ लोगों के
जीत के लिये;
हार जाना बस
हार जाना ही होता है,
जहाँ चुप रहने को
ज़्यादा जगह मिलती है।



नाम
: अगस्त्य एन.

पटना, बिहार - 800002. 

व्हाट्सप्प : 9308485825 

Saturday, August 1, 2020

मैं भूल जाने का, एक मुक़म्मल सामान हूँ

"ग़ज़ल"                                                  "अगस्त्य" 

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मैं भूल जाने का, एक मुक़म्मल सामान हूँ 
तेरा क्या दोस्त, मैं भी ख़ुद से अनजान हूँ;

ख़ाक को उठा के हाथ से, क्या रगड़ा है कभी 
उसी क़िस्म का मैं भी, मिटता हुआ बयान हूँ; 

स्याह भी रौशन भी, ये राबता मुझे नागवार 
मैं तो शाम के मेले में, भटका एक इंसान हूँ; 

दुआ करो कि मुझे मौत, हँस- हँस के मिले 
इस रोती हुई ज़िंदगी से, मुसलसल हैरान हूँ; 

ख़बर थी कि शोलों को है, आब से शिकायत 
वही शोले छुपे हैं आब में, लाज़िम है हैरान हूँ; 

बात न तो मुद्दत की है और ना ही लम्हों की 
बात है सिलसिले की, जिसका मैं निगेहबान हूँ; 

गुज़र सको तो गुज़र जाओ, झोंके की तरह 
मैं तो बस रेत पे पड़ा, हवा का निशान हूँ; 

अगर देखी हो कभी तुमने, पानी से लिखी तहरीर 
बस उतना ही टेढ़ा हूँ, उतना ही आसान हूँ;  
----------------------------------------------------------
"अगस्त्य" 
पटना - 01-08-2020

Monday, October 9, 2017

IF MY HEART IS A RADIO

If my heart is a radio 
I’ll catch you every morning, through the wave. 
Pulling up my mind to the raindrops 
I’ll sing you as a song through the wave. 
Its new time of taking up the tuning my heart 
It’s a new dimension of the purest trust. 
That my heart is radio and you are a song!

If my heart is a radio 
I’ll catch you every morning through the wave. 
The Sun and the Moon will pass through the globe 
and I will walk in the woods away from noise, 
The joy of talking with the dense forest 
I‘ll be living through a tranquil poise. 

If my heart is a radio 
I’ll catch you every morning through the wave, 
Pulling up my mind to the world of stars 
I’ll sing you as a song through the wave. 
Its new time of taking up the tuning my heart 
It’s a new dimension of the purest trust, 
That my heart is radio and you are a song!


             ******* 
Nirmal Augastaya

Saturday, January 10, 2015

"प्रेम को क्या चाहिये"


जैसा भी और जितना भी है आसमान!
गोल, सपाट, किनारों पर झुका हुआ।
एक बिस्तर भर या थाली भर,
या जितना क्षेत्रफल ललाट का है
कम से कम उतना ही सही!
प्रेम पर लिखने के लिये तो काफी ही है।


और वैसे भी प्रेम पर
कोई इससे ज़्यादा क्या लिख सकता है,
एक अपने और एक उसके नाम के अलावा।
हालाँकि, प्रेम अगर वास्तव में है
तो नाम लिखना भी कोई विशेष उपक्रम नहीं है।


जैसा भी और जितना भी है आसमान!
फैला हुआ या बहता हुआ,
या उस वक़्त तक ठहरा हुआ
जब तक हम इसकी तरफ देखते रहते हैं।
उसमें जितना भी नीलापन है,
यहाँ से वहाँ तक लगातारपन की आभा
और जितनी जगह वो निकाल सकता है,
ले तो आता ही है प्रेम के लिये।


चाहे वो तुम्हारा हो, मेरा हो
या किसी और का हो।
इसमें कोई संशय नहीं
कि स्वीकृति अच्छी बात है
लेकिन क्या इतना
कि आसमान पर ठप्पा लगाने से बचा न जा सके।


दो नाम या दो शब्द की बात नहीं है,
बात सांकल और सिटकनी की है।
आसमान चाहे जितना भी है,
उसे आसमान बने रहने का पूरा अधिकार है।
उसमें सांकल और सिटकनी लगा कर
दरवाज़ा बना देना घोर अन्याय है।
तुम प्रेम के बारे में, अपने बारे में,
उसके बारे में एक बार और विचार कर  देख सकते हो
कि उसे क्या चाहिये,
विस्तार या दरवाज़ा ?

निर्मल अगस्त्य।
 .......

Thursday, January 8, 2015

‘‘खोंचर कीजिये, सुख से रहिये’’

न्सान और जानवर में अनगिनत अन्तर है और उन सबों में से एक है खोंचर करने की योग्यता जो हर इन्सान में अनिवार्य रूप से मौजुद है। लेकिन इस योग्यता का प्रभावी होने के लिये आपके ग्रे-मैटर में इसके कीटाणुओं का न्युनतम संख्या में होना आवश्यक है। विज्ञान के हिसाब से थ्रेशहोल्ड ऍमाऊन्ट। अब जैसे ई.कोलाई और बी.कोलाई के कीटाणु हमारे शरीर में एक न्युनतम संख्या से ऊपर होने के बाद ही रोग के लक्षण प्रगट करने की क्षमता रखते हैं तो एक सफल ‘खोंचरिस्ट’ बनने के लिये यह नितान्त आवश्यक है कि आपके ग्रे-मैटर में इसके कीटाणुओं की संख्या थ्रेशहोल्ड अमाउन्ट से बहुत अधिक हो। यह एक देशी शब्द है। इसकी उत्पत्ति  शायद ‘खोंच’ या ‘खरोंच’ से हुई हो सकती है। खोंच लगना, खोंच लग गया, कुर्सी खोंचहा हो गया है... इत्यादी। ये सब अपने बिहार के बहुत से जिलों के लोगों के कहते सुना होगा। ऐसी कोई भी नुकीली या कंटीली वस्तु जो आपके शरीर, कपडे़ या किसी भी वस्तु में खरोंच डाल सके, खोंच देने वाली खोंचहा कहलाती है। यहाँ पर यह संज्ञा है। लेकिन जब हम कहते हैं खोंच लग गया तब यहाँ यह विशेषण है जैसे दर्द हो गया में दर्द विशेषण है और घाव लग गया में घाव संज्ञा है। अब बात रही खोंचर करने की, तो जब यह खोंचहा वस्तु जो एक देशी टूल है, को किसी चीज को खरोंचने के लिये उपयोग में लाया जाता है तो उसे खोंचर करना माना जा सकता है। हालाँकि यह शब्द ‘खोंच’, ‘कोंच’ शब्द के काफी नजदीक है लेकिन दोनों में बहुत अन्तर है। कोंच देने का मतलब होता है अन्दर तक ठूँस देना। अब तीस सीट वाली बस में नब्बे लोग आप बिठा तो नहीं सकते। तब कोंच देना नाम की इस तकनीक का सफलतम प्रयोग जनसंख्या के उच्च घनत्व वाले इलाकों में हमेशा ही किया जाता है।
जबकि खोंच हमेशा ऊपरी सतह पर लगाया जाता है। आपने अपने जीवन में भी इसे किसी न किसी रूप में महसूस किया होगा। कभी काँटों की वजह से, कभी किसी पुरानी कुर्सी में बेहया की तरह पूँछ की तरफ से निकल आये किसी कील की वजह से तो कभी बाँस या लकड़ी में कहीं पर आवारा की तरह निकल आये मोटे रेशे की वजह से। इस खोंच का हाफ ब्रदर है ‘काँप’। यह काँपने वाला काँप नहीं है। जब भी किसी लकड़ी अथवा बाँस की बनी वस्तुओं, जैसे सूप, डगरा की कमानी से कोई टुकड़ा चमडे़ को खरोंचता हुआ अंदर घुस जाये और घुसा रह जाये तो उसे कांप लगना कहते हैं। कुछ लोग, खास कर शहर में रहने वाले लोग जो घरेलू भाषा का प्रयोग नहीं करते हैं, सवाल उठा सकते हैं कि इसे गड़ना या धसना क्यूँ नहीं कह सकते। वो इसलिये नहीं कह सकते कि गड़ने या धंसने की प्रक्रिया में वस्तु माँस में घुस जाती है जबकि काँप लगने की प्रक्रिया में वस्तु चमडे़ में फंस के रह जाती है। दूसरी मुख्य बात यह है कि काँप लगने में वस्तु चमडे़ के समानान्तर होती है जबकि गड़ने या धँसने में वस्तु माँस के लम्बवत भी हो सकती है, तिरछे हो सकती है और समानान्तर भी।
तो खोंच लगने का मतलब आप समझ गये। ऊपरी क्षति, कम नुकसान, घाव भरने में कम वक्त लेकिन बेचैनी और छटपटाहट काँप लगने और गड़ने-धँसने से ज्यादा। काँप लगने और गड़ने-धँसने के बाद अगर किसी महीन चिमटे या सुई की नोक से उस वस्तु को निकाल दिया जाये तो दर्द एकदम छू-मन्तर हो जाता है लेकिन खोंच लगने के बाद आपको तबतक दर्द सहना है जब तक घाव भर न जये। अब आप में से कुछ पाठक मुझसे सवाल कर सकते हैं कि अगर छूरा या गोली धंस जाये तब यह विश्लेषण तो ’आप’ की दिल्ली सरकार की तरह धराशायी हो जायेगा। तो बन्धू, आप सवाल नहीं कर रहे हैं बल्कि खोंचर कर रहे हैं। बात को समझ के भी काटने की कोशिश करने की प्रक्रिया भी, खोंचर करना कहलाती है। आप के घर में शादी-विवाह, छठ्ठी-छिल्ला इत्यादि का उत्सव तो होता ही रहा होगा। आप इन मौके पर ऐसे प्राणियों को बहुत आसानी से ढूँढ़ सकते हैं जो खोंचर करने में एक्सपर्ट हों।
हमारे यहाँ विवाह समारोह में रिश्तेदार तीन-चार दिन पहले से आने लगते हैं। इक्कीसवीं सदी में यही एक आराम मिला है हम सभी को कि अब लोगों के पास उतना समय नहीं है अन्यथा बीसवीं सदी के अन्तिम दशक तक रिश्तेदार एक महीना पहले ही आ जाते थे। तो इतने लोगों का खाना बनाने के लिये किसके घर में बर्तन रहेगा भला। तो जाहिर सी बात है लोग हलवाई रखते हैं। ये घरभोज या घरभैया भोज वाले हलवाई कहलाते हैं। हालाँकि घरभोज को गृहप्रवेश का भोज भी कहा जाता है तो आईये घरभैया भोज से काम चलाते हैं। अभी इनका रेट पाँच सौ रूपये प्रति आदमी से लेकर नौ सौ रूपये तक है। प्रति आदमी का मतलब खाने वालों की संख्या से नहीं बल्कि हलवाई और उसके कारीगरों की संख्या से है। अब पाँच दिन या एक सप्ताह कोई भी न तो छप्पनभोग खा सकता है, न खिला सकता है तो भात, दाल, भुजिया, दो तरह की घरेलू स्टाईल की सब्जी, चोखा-चटनी, पापड़-तिलौड़ी खिलाने के लिये कैटरर को बुक करना तो बेवकुफी है। तब ऐसे घरवैया भोज वाले हलवाईयों को काम पर रखा जाता है। अब इतने रिश्तेदारों में वो खोंचरिस्ट कहीं न कहीं इस मौके का इन्तजार कर रहा होता है जो अगर जवान हो तो यू-ट्यूब पर संजीव कपूर, तरला दलाल और निशा मधुलिका सरीखे नामचीन विशेषज्ञों का वीडियों देख कर वर्चुअल हलवाई बन चुका होता है और अगर बूढ़ा या अधेड़ हो तो अपने उम्र से बीस गुना भोजों में खा चुका होता है। अब उनकों भी पता है कि उनकों आलू-गोभी का दम, बिरयानी और राजभोग बनाने के लिये नहीं रखा गया है, फिर भी बैठ जायेंगे स्टूल लगा के गैस सिलिन्डर के पास और लगेंगे खोंचर करने।
अच्छा केसर कहाँ से खरीदते हो भाई। आजकल केसर के नाम पर एसेंस में डुबाया हुआ, धोती रंगने वाला चम्पई रंग से रंगा हुआ दूब्बी बिकता है बजार में, समझ कि नहीं। अच्छा छीलने के बाद प्याज धोये की नहीं। देखो, छौंकने समय तुमलोग मेथी पहले डालते हो और जीरा बाद में इसलिये तुमलोग का बनाया खाना घर जैसा नहीं लगता। सुनो, मसाला पिसवाओगे त हमको बुला लेना, हम बतायेंगे कि केतना-केतना पडे़गा। अच्छा, चायपत्ती उधर ठोंगा में काहे रखे हो जी। चायपत्ती हमेशा स्टील के डिब्बा में रखा जाता है। वगैरह-वगैरह। कुछ देर में हलवाई को विश्वास होने लगता है कि वह चोखा बनाने लायक भी नहीं है। ऐसी हजारों बातें होती हैं शादी-विवाह और किसी उत्सव वाले घर में। ऊपर तो मैनें बस कुछ सैम्पल लिखा है क्युँकि हर किसी को ऐसे खॉंचों से गुजरना पड़ता है और आप सब भी ऐसी खोंचर करने वाली बातों से पूर्णतया परिचित होंगे।
अपना रोजगार कीजिये तो नौकरी करने वाले दोस्त, रिश्तेदार आपको खोंचर करेंगे। नौकरी कर लीजियेगा तो अपना रोजगार करने वाले दोस्त, रिश्तेदार आपको खोंचर करेंगे। अगर आपका भूगोल अच्छा है तो इतिहास वाला मास्टर खोंचर करेगा। अगर आपका सारा विषय अच्छा ह तो आर्ट एन्ड क्राफ्ट, पी.टी. और स्पोटर्स टीचर आपको खोंचर करेगा।
आप रोग से बच सकते हैं। दुश्मन से बच सकते हैं। यहाँ तक कि पाकिस्तान से भी बचे रह सकते हैं लेकिन खोंचरिस्ट से नहीं बच सकते क्योंकि ये आपके बेहद करीब के लोग होते हैं जिन्हें पलटवार कर सबक सिखाने का जोखिम आप नहीं ले सकते। अगर आप बेटी का ब्याह आई.ए.एस. अधिकारी से ठीक कर दीजिये तो बैंक में काम करने वाले रिश्तेदार खोंचर करेंगे। बेटे का ब्याह किसी दूसरे जिले में ठीक कर दीजिये तो जिन्होंने अपने बच्चों का ब्याह अपने ही जिले में कर दिया है वो आपको खोंचर करेंगे। अगर आप स्कूटर खरीद लाईयेगा तो बाईक चलाने वाले खोंचर करेंगे और अगर आपने जिम जाना शुरू कर दिया तो योगा क्लास वाले खोंचर करेंगे।
मोटा-मोटी यह विशेष योग्यता विकासशील देशों के लोगों में पाई जाती है। इसका जात, धर्म, लिंग, वर्ग  और उम्र से कोई लेना देना नहीं है। अपने भारतवर्ष को ही ले लीजिये आप। खोंचर करना एक सर्वव्यापी आचरण है। भारत का नागरिक खोंचर किये बिना रह ही नहीं सकता। पचपन प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है और सालों भर खेती आप कर नहीं सकते। जब खेत में पहले से ही फसल लगी हो तो ‘कन्ट्रोल एन’ दबा के आप नया खेत तो बना नहीं सकते। अब, जब फसल कटेगी तब जा के खेत खाली होगा। तो इस बीच आप तो खाली हैं। क्या कीजियेगा इस खाली समय का जिसमें पैसा भी खर्च नहीं हो, आनन्द भी आये और खाली समय भी सटा-सट कट जाये। तो खोंचर कीजिये और क्या। अब रहे बाकि पैंतालिस प्रतिशत लोग। अब इसमें से जो सरकारी कर्मचारी हैं उनके पास खोंचर करने का स्कोप सबसे ज्यादा है। कहा जाता है कि सरकारी नौकरी मिलना जितना कठिन है, उससे भी कठिन है किसी को उससे निकलवा देना। तो चपरासी से लेकर प्रधान सचिव तक इस पारम्परिक और कभी न लुप्त होने वाली कला के रियाज में लगे रहते हैं। चपरासी बिलम्बित लय में खोंचर करेगा, बीच का कर्मचारी मध्य लय में ओर आला अधिकारी द्रुत लय में। फिर बचे प्राईवेट सेक्टरों में काम करने वाले। तो यहाँ पर वे बडे़ बदकिस्मत हैं क्युँकि उनके पास खोंचर करने का ज्यादा स्कोप है नहीं। वहाँ खोंचर सिर्फ मैनेजमेंट कर सकता है। तो ऐसे लोग सामान्यतः शादी-ब्याह, छठ्ठी-छिल्ला में इस कला का प्रदर्शन कर काम चलाते हैं। अब बचे अपना रोजगार करने वाले लोग। तो ये वास्तव में खोंचर की दुनिया के असली जादूगर हैं। अगर आप खोंचर करना नहीं जानते तो कभी अपना रोजगार-व्यापार नहीं बढ़ा सकते।
अब इसमें एक सबसे ऊपर क्रीमी लेयर टाईप का एक लेयर है जिनकी संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है लेकिन भारतवर्ष की मीडिया और सोशल मीडिया इन्हीं खोंचरिस्टों की वजह से इतनी अमीर हो रही है कि आज हर मौकापरस्त इसमें शामिल होना चाहता है। इस क्रीमी लेयर खोंचरिस्ट्स की लिस्ट में सेलेब्रिटीज भी हैं, राजनेता भी हैं, अभिनेता भी हैं, सोशलिस्ट भी हैं, मार्क्सिस्ट भी हैं, कम्यूनिस्ट भी हैं, स्वयंभू सन्त भी हैं, टोपी-दाढ़ी वाले बडे़ कद के मौलाना-मौलवी भी है, चंदन-टीका वाले बडे़-बडे़ पण्डित, महन्त और बाबा भी हैं। इनका किया हुआ एक खोंचर दो-तरफा कार्य करता है। किसी लॉबी को बहुत फायदा पहुँचता है और किसी लॉबी को बहुत नुकसान।
यहाँ तक कि खोंचर करने की इस कला को व्यवसाय में भी सफलतापूर्वक समाहित कर लिया गया है। अब सिंघम बाबू को अपनी कोई फिल्म पिटती दिखाई देयी तो एक लॉबी उसी टाइम में इस फिल्म के बारे में, प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इतना खोंचर करेगी कि लोग उस फिल्म के प्रति उत्सुक हो जायेंगे। बहुत लोगों को तो ये भी नहीं पता कि इधर कुछ नेता जो नये सरकार की कार्यवाहियों और उनके सम्बन्धित मन्त्रियों का खोंचर करने में लगे रहते हैं, वो दरअसल प्रायोजित खोंचरिस्ट हैं।
इसे मैनेजमेन्ट गुरूओं की भाषा में निगेटिव पब्लिसिटी कहते हैं। आप एक आदमी को सौ रूपया दीजिये और कहिये कि वो पूरे मुहल्ले में प्रचार कर दे कि कल सुबह आप अपनेे घर से बाहर डान्स करने वाले हैं। मैं भरत मुनि का नाम दे के आपको चैलेन्ज करता हूँ, कोई नहीं आयेगा। लेकिन अगर आप उस आदमी को सौ रूपये देने का बाद ये कहें कि वह मुहल्ले में प्रचार कर दे कि अगली सुबह आप अपने घर के बाहर कपड़ा-फाड़ डान्स करेंगे तो कसम भरत मुनि कि, आधा मुहल्ले आपके घर के  बाहर आ के जमा हो जायेगा।
तो ऐसा नहीं है कि खोंचर सिर्फ तकलीफ देने के लिये किया जाता है। कई बार इससे बहुत फायदा भी होता है। अरविन्द केजरीवाल एण्ड पार्टी ने कांग्रेस का इतना खोंचर किया कि भाजपा पूर्ण बहुमत में आ गई। केजरीवाल को भी पता है कि भारत का नागरिक भ्रष्टाचार पर भाषण सुनते समय एकदम से क्रान्तिवीर का नाना-पाटेकर हो जाता है लेकिन सभा स्थल से बाहर निकलते ही शूल फिल्म के सयाजी शिन्दे बनने में उसे एक मिनट भी देर नहीं लगती है और वह तो पी.एम. बनने से रहे। अब इससे हुआ यह कि केजरीवाल के सामने एक नया विकल्प प्रस्फुटित हो गया। अब वह भारतिय राजनीति के परम्यूटेशन-कॉम्बीनेशन में एक ऐसे फैक्टर हैं जो अपने खोंचर करने की अद्भुत कला से सरकार पलट सकते हैं। जब कुछ लोग कहते हैं कि केजरीवाल दरअसल भाजपा के तरफ से के.ओ.डी. अर्थात् खोंचरिस्ट औन स्पेशल ड्यूटी हैं तो मुझे आश्चर्य नहीं होता। इससे शानदार और किफायती टूल और क्या हो सकता है कि आप बस बोल के, खोंचर कर के पचास-साठ साल तक राज करने वाली पार्टी का इतना बुरा हाल कर सकते हैं। अरे भाई, अरविन्द केजरीवाल कोई पहले खोंचरिस्ट थोडे़ न हैं। इसके पहले भी कई खोंचरिस्ट आये, फिर भी सरकार तो राज कर ही रही थी। वास्तव में यह उनका सेल्फ डेवेलप्ड टैलेन्ट है जिसे उन्होंने बडे़ प्यार से, बड़ी मेहनत से तराशा है।
तो यह सब लवेद उनके बारे में हुआ जिनके ग्रे-मैटर में खोंचर के कीटाणुओं की संख्या एक खास न्युनतम मात्रा से अधिक होती है। लेकिन जिनके ग्रे-मैटर में इसके कीटाणुओं की संख्या एक खास न्युनतम मात्रा से कम होती है उनका क्या? माना कि ऐस लोगों में लक्षण प्रकट नहीं होते तो ये सिद्यांत तो गलत हो जायेगा कि हर आदमी में खांेचर करने की अनिवार्य योग्यता होती है और योग्यता बिना परिणाम दिखाये सिद्ध नहीं की जा सकती है। आपने अपने घरों में, खेतों में, खलिहान में, गोदामों में, रेलवे स्टेशन की पटरियों पर, किराने की दुकानों में, होटलों में, ढ़ाबों में दो तरह के चूहे देखे होंगे। एक छोटा वाला जो खाता कम है सामान ज्यादा काटता है। और एक बड़ा वाला जो खाली खाने के फेर में रहता है और काटम-कुट्टम तभी करता है जब अनाज के डब्बे में घुसने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा हो। ये बड़ा वाला चूहा वही चूहा है जिसको ‘‘खाने में गलत क्या है, हम भी खाते थे’’ बोल कर बिहार के वर्तमान मुख्यमन्त्री हाल-फिलहाल विवादों के घेरे में आ गये थे। हम अभी छोटे वाले चूहे के काटम-कुट्टम वाली खतरनाक आदत की समीक्षा करेंगे।
दरअसल चूहे के आगे वाले दाँतों को ईश्वर ने बढ़ते रहने का श्राप दिया है जिसे ‘इनसीजर’ कहते हैं। चुहों के ये दाँत उसी तरह बढ़ते हैं जैसे हमारे नाखून तो चूहे उन दाँतों की लम्बाई को न बढ़ने देने के लिये उन्हें घिसते रहते हैं। एक तरह से फाईलिंग करते हैं जैसे लड़कियाँ अपने नाखुनों को निश्चित आकार में और लम्बाई में बनाये रखने के लिये फाईलिंग करती है। अब इन्सान के पास तो तरह-तरह का औजार है लेकिन चूहा बेचारा क्या करे। वह सामान कुतरता रहता है ताकि दाँत की घिसाई हो सके। अगर ऐसा नहीं करेगा तो कुछ महीनों में उसके आगे वाले दाँत इतने लम्बे हो जायेंगे कि उसे दो पैर पर चलना पडे़गा और अगर चूहा दो पैर पर चलने लगेगा तो विकास की सीढ़ी पर वेटिंग लिस्ट में खडे़ बन्दर तो शर्म से मर ही जायेंगे और साथ ही साथ डार्विन और लैमार्क के सिद्धान्तों की बखिया उधड़ जायेगी। अब चूहा ठहरा श्री गणेश की सवारी। तो ऐसा होना उसे भी अच्छा नहीं लगेगा। इसलिये वह सामानों को कुतर-कुतर कर दाँत घिसता रहता है।
अब जो मैं कहना चाह रहा हूँ उसका आधार मेरा अनुभव है और मानव शरीर विज्ञान के जानकार इससे बिल्कुल सहमत नहीं होगें। अब ना होगें, तो न हों। हैदराबादी बिरयानी मैं हैदराबाद ढूँढिये, नहीं मिलेगा। कश्मीरी पुलाव में कश्मीर ढूँढि़ये नहीं मिलेगा। उसी तरह इन्सान के दिमाग में हमेशा बढ़ते रहने वाले दाँत भी होते हैं, शरीर विज्ञान के विशेषज्ञ ढूँढेगे, कभी नहीं मिलेगा। और इन्सान के दिमाग के यही दाँत खोंचर करने के काम आते हैं। चुँकि ये बढ़ते रहते हैं इसलिये इन्हें चूहे की तरह घिसते रहना परम आवश्यक है। दिमाग के इन दाँतों से बातों, सिद्धान्तों, फलसफों, तर्को, विचारों, भावनाओं और उपदेशों को कुतरा जाता है। यही प्रक्रिया खोंचर करना कहलाती है। अब जो दूसरे की बातों और सिद्धान्तों को खोंचर करते रहते हैं उनके दिमाग के भीतर उगे खोंचर करने वाले ये दाँत बाहर की तरफ बढ़ते हैं और ऐसे लोगों में खोंचर करने वाले कीटाणुओं की संख्या थ्रेशहोल्ड अमाउन्ट से ज्यादा होती है। लेकिन जिस किसी भी इन्सान में इन कीटाणुओं की संख्या थ्रेशहोल्ड अॅमाउन्ट से कम होती है उनके दिमागों में ये दाँत भीतर की तरफ मुडे़ होते हैं और वे भीतर की तरफ ही बढ़ते हैं। ऐसे लोग दुसरों का खोंचर नहीं कर पाते और एकान्त में अपने को ही खोंचर करते रहते हैं। दार्शनिक, चिन्तक, कवि, लेखक माइग्रेन और रक्तचाप के मरीज इसी श्रेणी में आते हैं।
यहाँ तक कि इन्सान की पहली कलात्मक अभिव्यक्ति खोंचर के रूप में शुरू हुई थी जब उसने गुफाओं के दीवारों पर खरोंच मार-मार कर तरह-तरह का चित्र बनाना शुरू किया था। अन्दर दबी मानसिक ऊर्जा को जब निकास नहीं मिलता तब यह ऊर्जा मनुष्य को उद्वेलित करती है। तब मनुष्य इसे सृजन और रचनात्मक अभिव्यक्तियों में खर्च करता है ताकि यह ऊर्जा बाहर निकल सके। गायन, वादन, लेखन, चित्रकारी, मुर्तिकारी, कढ़ाई, बुनाई, शिल्पकारी और भी न जाने कितने कलात्मक कार्य हैं जिसके द्वारा आप अपनी मानसिक उर्जा को सृजन के क्रम में बाहर निकालते हैं। इन सारे कार्यों में एक खास बात यह है कि जितनी मानसिक उर्जा खर्च होती है उससे दुगुनी फिर से बन भी जाती है जबकि खोंचर एक ऐसा कार्य है जिसमें मानसिक उर्जा का केवल निकास होता है।
सन्सार में कोई ऐसा काम नहीं है जिसमें खोंचर नहीं किया गया हो। यह एक वैश्विक प्रक्रिया है। खुद अमेरिका के पास परमाणु बम है लेकिन अगर भारत जैसे देश इसे अपने पास रखना चाहेंगे तो वो खोंचर करेगा। चीन भी खोंचर करेगा, जापान भी करेगा। जर्मनी, इटली, फ्रांस, सब खोंचर करेंगे। ऐलोपैथ का डॉक्टर हेम्योपैथी और आयुर्वेद को खोंचर करेगा। मूल तौर पर मैं यहाँ इस लेख में कर क्या रहा हूँ ? जी हाँ, बिल्कुल सही समझे आपलोग। मैं खोंचर कर रहा हूँ, और क्या। तो, सौ बात की एक बात- ‘‘खोंचर कीजिये, सुख से रहिये!’’
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
8 जनवरी 2015
पटना

Wednesday, December 31, 2014

"ये बात और है - कि शायद कुछ भी नहीं"


नया क्या होने वाला है ?
शायद कुछ भी नहीं,
जो ये दुआ कर रहे थे
कि जल्दी से चली जाए ये ठंड
और मिल जाए ये सोचने का बहाना
कि ज़िंदगी काट जाती है
कम्बल और अलाव के बिना,
उनको फ़र्क पड़ा क्या।


नया क्या होने वाला है ?
शायद कुछ भी नहीं,
कि मोहल्ले में
एके दबंग युवक बीच रास्ते में
अपनी गाड़ी रोक कर
सबको दे रहा था गालियाँ
और शराब से ज़्यादा ताकत के नशे में चूर
बगल से गुजरते हुए हर आम इन्सान को
ज़िंदा होते हुए भी
अपने को मृत और
शरीर में पांच लीटर लहू,
दो हाथ, दो पाँव
और एक दिमाग़ होते हुए भी
अपने को अनाकृत मान लेने का
अभ्यास करा रहा था।
जो लोग मौन थे
वो उसकी जाति के थे
जो लोग मज़ा ले रहे थे
उनकी कोई जात नहीं थी
और जो लोग गालियाँ सुन कर भी
परिवार के बारे में सोच कर बढ़ जा रहे थे
वो किसी भी जाति के हों
चाहे कायस्थ, भूमिहार, राजपूत,
ब्राह्मण, यादव, बनिया, धानुक, कुर्मी
दुसाध, डोम, चमार या कुछ और
ग़ाली सुनते समय एक ही जाती के थे।
नया क्या होने वाला है ?
शायद कुछ भी नहीं,


क्या ये नया था
कि इस शाम हम
पिछले साल से महंगी शराब पीने वाले थे?
या ये नया था कि
कैलेंडर के कुछ अंक बदल जाने वाले थे ?
या फिर ये नया था
कि "भूल जाओ ये छोटी मोटी बात"
कहने वाले कुछ और नए मित्र बनने वाले थे ?
या शायद ये नया था
कि ऐसी सूअर से बिना लड़े
घर लौट आने कि कला पर
पिता से शाबासी मिलने वाली थी।  


नया क्या होने वाला है ?
शायद कुछ भी नहीं,
कि पार्टी में नृत्य हो रहा था
लेकिन एक नृत्य मेरे जेहन में हो रहा था
कि आख़िर आज बारह बजे के बाद
नया क्या हो जाएगा,
पार्टी में खाना हो रहा था
और एक सवाल मुझे खा रहा था
कि सही होते हुए भी
हार मान लेना या बच के निकल जाना
कला क्यूँ  हो गया है,
पार्टी में सिगरेट सुलग रही थी
और मेरा अन्तर्मन
इस बात पर सुलग रहा था
कि भीड़ या तो बेबस या एकदम उन्मादी
क्यूँ होती है।


नया क्या होने वाला है ?
शायद कुछ भी नहीं,
मैं पहले  कवितायेँ लिखता था
आज भी लिख रहा हूँ,
मैं पहले भी बिखरता रहा था
आज भी बिखर रहा हूँ,
मैं पहले भी कहता रहा था
कि हथियार और असलहे से
तस्वीर नहीं बनती, बस तारीख़ बनती है,
ये आज भी कह रहा हूँ।


चूँकि सभी कह रहे थे
तो मैंने भी सोचा कि
कुछ नया होने वाला है,
ये बात और है -
कि शायद कुछ भी नहीं।

''निर्मल अगस्त्य''

Tuesday, November 25, 2014

‘‘राम बनना है तो इनव्हेस्ट कर!’’


न को भी एजेन्टस् की आवश्यकता नहीं है। कोई उसका एजेन्ट बन भी नहीं सकता।
तुम्हारी एजेन्सी की लुटिया डूबो देगा ये कम्बख़्त मन। यह तुम्हारे अन्दर होकर भी तुम्हारी पहुँच से बाहर है।
इस पर विवेचना करोगे तो तुम स्वाद से बिछड़ जाओगे। चाहे वह सन्देश हो या किसी का रूप।
गुरू कहते रहे- ‘‘विवेक मन की लगाम है।’’
लो... पकड़ो !!!
अब कसते रहो लगाम...!
गोया तुम्हारा जन्म ही हुआ है लगाम कसने और नाल ठोंकने के लिये। सभी जानते हैं कि राम एक ही थे जो कभी मर्यादापुरूषोत्तम बन कर पृथ्वी पर अवतरित हुये थे। गुरूओं को आभास है कि राम दुबारा नहीं आने वाले अतः, उन्होंने राम बनाने का ठेका ले रखा है। उन्होंने कारखाने डाल रखे हैं, उनके वर्कशॉप में पर-वचन निरन्तर चल रहा है। पर-वचन...! जो ज्ञान दूसरों के लिये है। अपने लिये सुरा है, सुन्दरी है, मेवा है, कलेजी है।
अब उनको आभास है कि राम तो आयेगा नहीं तो क्रॉस व्हेरीफि़केशन का झंझट तो है ही नहीं। तीन महीने की एक्सटेन्सिव ट्रेनिंग और आधी जमापूंजी ख़र्च करने के बाद तुम्हारा सतर्क दिमाग़ ख़ुद ही बोल पड़ेगा कि अब कौन सी तुम्हारी सीता का हरण होने वाला है, और तुम्हारा बाप भी किसी कैकयी के फेर में नहीं पड़ने वाला। एक कौशल्या को सम्भालने में उसका पूरा शरीर टिस-टिस करता रहता है। आर्थराइटिस, स्पॉन्ड्लाइटिस, गैस्ट्राईटिस और भी न जाने कौन-कौन सा ‘टिस’।
दिमाग़, बही खाते को देखकर कहेगा- चलो बहुत हुआ... हो गये तुम राम... समझ गये मन को पकड़ने का गुर...। गुरू को प्रणाम खींच और चुपचाप निकल ले वरना प्रमोशन और इन्क्रीमेन्ट की गाड़ी पकड़ने की कला भूल जाओगे। तुम भी गदगद होकर सोचोगे- हाँ भई, कोई मशीन थोड़े ना बना है यह नापने के लिये कि तुमने मन को पकड़ के रखा है या नहीं या पकड़ कर रखा है तो कहाँ रखा है। तीस से चालीस लाख ख़र्च कर के जब डिप्टी कलक्टर बना जा सकता है तो किसी आश्रम में डेढ़ करोड़ खर्च कर के राम तो शर्तिया बना जा सकता है।
प्रोडक्ट मैनेजर बने रहना तो इन्सान का पहला धर्म है। इतना मँहगा प्रोडक्ट भला ख़राब होता है क्या। लो जी... तुम मन को जीत गये। राम बन गये। जाओ आज छुट्टी।
अभी-अभी ‘इन्सेपशन’ रीलिज़ हुई है। जा के देख आओ। तुम त्रेता युग के राम से ज्यादा धनी हो।
तुम दीक्षा सम्पन्न होने के उपरान्त ‘अवतार’ और और ‘इन्सेप्शन’ भी देख सकते हो। सीता घर में भाड़ झोंक रही है। तुम चौपाटी पर अपनी सेकेटरी के साथ रोमान्स कर सकते हो।
तुम राम से ज्यादा क्वालीफ़ायड हो। तुम्हारा रिज़्यूमे राम से ज्यादा तगड़ा है। तुम्हारी डिग्री ऑक्सफ़ोर्ड से मान्यता प्राप्त है। बेचारे राम क्या, उनके बाप दशरथ ने भी ऑक्सफ़ोर्ड का नाम नहीं सुना होगा।
तो इतनी मँहगी प्रक्रिया से गुज़रनी पड़ती है मन को पकड़ पाने के लिये। जितनी तेज़ी से पैसे ख़र्च होंगे उतनी ही तेज़ी से तुम सीखते जाओगे। नहीं भी सीखोगे तो तुम मान लोगे कि तुम सीख रहे हो।
कोई तुम्हारे सर पर हाथ रखकर कहे- तुम्हारे अन्दर बुद्ध छिपा बैठा है। तुम बुद्ध हो।
तुम उसे पागल समझ कर भगा दोगे, जबकि ऐसा बिल्कुल सम्भव है कि तुम वाकई बुद्ध का ही अवतार हो। बुद्ध को भी तुम्हारी तरह राजयोग मिला था। पर तुमने अभी इनव्हेस्ट नहीं किया इसलिये तुम अपने अन्दर के प्रोडक्ट की कीमत नहीं समझ रहे हो।
अगर तुम्हारी बीबी तुम्हारे नौकर के साथ भाग जाये, तुम्हारा बेटा बलात्कार कर फाँसी चढ़ जाये और तुम्हारा नौकर तुम्हारा सब कुछ हड़प ले और तब वही आदमी तुम्हारे सर पर हाथ रखकर तुम से कहे कि तुम बुद्ध हो, तुम्हारे अन्दर बुद्ध का अंश है तो तुम तत्क्षण उसे बोधि वृक्ष मान कर उसके कदमों में लम्बलेट हो जाओगे और कहोगे- ‘‘तुम अब कहाँ थे गुरू।’’
गुरू कहीं नहीं था। वो तो बस तुम्हारे इनव्हेस्टमेन्ट का इन्तज़ार कर रहा था। तुमने बीबी इनव्हेस्ट कर दी, तुमने बेटा इनव्हेस्ट कर दिया, तुमने प्रापर्टी इनव्हेस्ट कर दी, उसने तुम्हें बुद्ध बना दिया। तुम्हें समझा दिया कि तुम मन को पकड़ने का सार जान गये हो। जाओ-इस सर्टिफि़केट को अच्छी तरह मढ़वा कर अपने गले में टाँग लो। अभी तुम्हारे आगे-पीछे चेलों की भीड़ लगने वाली है इसलिये इसकेे पहले पास के मल्टीप्लेक्स में लगी ‘इन्सेप्शन’ देखकर घर जाना। सपने में सपना, सपने में सपना का मज़ा ले के जाना।
ये सुविधा राम को नसीब नहीं थी भाई और ‘इन्सेप्शन’ जैसी फि़ल्म दस रूपये की सी.डी. पर कभी समझ में नहीं आयेगी तुझे। चार सौ रूपये का टिकट ले, तब तू मुहल्ले में जा के कह सकेेगा कि तुझे ‘इन्सेप्शन’ समझ में आ गई है।
लोग पूछेंगे- ‘‘काहे का ‘इन्सेप्शन’? कहीं यह ‘कोन्ट्रासेप्शन’ की बड़ी बहन तो नहीं है?’’ तुम कहोगे- ‘‘नहीं यारों, ‘इन्सेप्शन’... ‘इन्सेप्शन’... माने... मल्टीप्लेक्स वाली ‘इन्सेप्शन’...’’
लोग कहेंगे- ‘‘धत्त तेरे की! ऐसा बोल ना कि ‘इन्सेप्शन’... देखा।’’ मल्टीप्लेक्स सुनते ही वे लोग भी समझ जायेंगे तू किस ‘इन्सेप्शन’ की बात कर रहा है और तू तो चार सौ का टिकट कटाते ही समझ गया होगा- ‘इन्सेप्शन’...!
‘इन्सेप्शन’...! माने ‘इन्सेप्शन’...! और क्या!
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
‘उपन्यास अंश’ ‘‘बस एक तीली’’ से
तुम्हारी एजेन्सी की लुटिया डूबो देगा ये कम्बख़्त मन। यह तुम्हारे अन्दर होकर भी तुम्हारी पहुँच से बाहर है।इस पर विवेचना करोगे तो तुम स्वाद से बिछड़ जाओगे। चाहे वह सन्देश हो या किसी का रूप। गुरू कहते रहे- ‘‘विवेक मन की लगाम है।’’लो... पकड़ो !!!अब कसते रहो लगाम...!गोया तुम्हारा जन्म ही हुआ है लगाम कसने और नाल ठोंकने के लिये। सभी जानते हैं कि राम एक ही थे जो कभी मर्यादापुरूषोत्तम बन कर पृथ्वी पर अवतरित हुये थे। गुरूओं को आभास है कि राम दुबारा नहीं आने वाले अतः उन्होंने राम बनाने का ठेका ले रखा है। उन्होंने कारखाने डाल रखे हैं, उनके वर्कशॉप में पर-वचन निरन्तर चल रहा है। पर-वचन...! जो ज्ञान दूसरों के लिये है। अपने लिये सुरा है, सुन्दरी है, मेवा है, कलेजी है।अब उनको आभास है कि राम तो आयेगा नहीं तो क्रॉस व्हेरीफि़केशन का झंझट तो है ही नहीं। तीन महीने की एक्सटेन्सिव ट्रेनिंग और आधी जमापूंजी ख़र्च करने के बाद तुम्हारा सतर्क दिमाग़ख़ुद ही बोल पड़ेगा कि अब कौन सी तुम्हारी सीता का हरण होने वाला है, और तुम्हारा बाप भी किसी कैकयी के फेर में नहीं पड़ने वाला। एक कौशल्या को सम्भालने में उसका पूरा शरीर टिस-टिस करता रहता है। आर्थराइटिस, स्पॉन्ड्लाइटिस, गैस्ट्राईटिस और भी न जाने कौन-कौन सा ‘टिस’।दिमाग़, बही खाते को देखकर कहेगा- चलो बहुत हुआ... हो गये तुम राम... समझ गये मन को पकड़ने का गुर...। गुरू को प्रणाम खींच और चुपचाप निकल ले वरना प्रमोशन और इन्क्रीमेन्ट की गाड़ी पकड़ने की कला भूल जाओगे। तुम भी गदगद होकर सोचोगे- हाँ भई, कोई मशीन थोड़े ना बना है यह नापने के लिये कि तुमने मन को पकड़ के रखा है या नहीं या पकड़ कर रखा है तो कहाँ रखा है। तीस से चालीस लाख ख़र्च कर के जब डिप्टी कलक्टर बना जा सकता है तो किसी आश्रम में डेढ़ करोड़ खर्च कर के राम तो शर्तिया बना जा सकता है। प्रोडक्ट मैनेजर बने रहना तो इन्सान का पहला धर्म है। इतना मँहगा प्रोडक्ट भला ख़राब होता है क्या। लो जी... तुम मन को जीत गये। राम बन गये। जाओ आज छुट्टी।अभी-अभी ‘इन्सेपशन’ रीलिज़ हुई है। जा के देख आओ। तुम त्रेता युग के राम से ज्यादा धनी हो।तुम दीक्षा सम्पन्न होने के उपरान्त ‘अवतार’ और और ‘इन्सेप्शन’ भी देख सकते हो। सीता घर में भाड़ झोंक रही है। तुम चौपाटी पर अपनी सेकेटरी के साथ रोमान्स कर सकते हो।तुम राम से ज्यादा क्वालीफ़ायड हो। तुम्हारा रिज़्यूमे राम से ज्यादा तगड़ा है। तुम्हारी डिग्री ऑक्सफ़ोर्ड से मान्यता प्राप्त है। बेचारे राम क्या, उनके बाप दशरथ ने भी ऑक्सफ़ोर्ड का नाम नहीं सुना होगा।तो इतनी मँहगी प्रक्रिया से गुज़रनी पड़ती है मन को पकड़ पाने के लिये। जितनी तेज़ी से पैसे ख़र्च होंगे उतनी ही तेज़ी से तुम सीखते जाओगे। नहीं भी सीखोगे तो तुम मान लोगे कि तुम सीख रहे हो।कोई तुम्हारे सर पर हाथ रखकर कहे- तुम्हारे अन्दर बुद्ध छिपा बैठा है। तुम बुद्ध हो।तुम उसे पागल समझ कर भगा दोगे, जबकि ऐसा बिल्कुल सम्भव है कि तुम वाकई बुद्ध का ही अवतार हो। बुद्ध को भी तुम्हारी तरह राजयोग मिला था। पर तुमने अभी इनव्हेस्ट नहीं किया इसलिये तुम अपने अन्दर के प्रोडक्ट की कीमत नहीं समझ रहे हो।अगर तुम्हारी बीबी तुम्हारे नौकर के साथ भाग जाये, तुम्हारा बेटा बलात्कार कर फाँसी चढ़ जाये और तुम्हारा नौकर तुम्हारा सब कुछ हड़प ले और तब वही आदमी तुम्हारे सर पर हाथ रखकर तुम से कहे कि तुम बुद्ध हो, तुम्हारे अन्दर बुद्ध का अंश है तो तुम तत्क्षण उसे बोधि वृक्ष मान कर उसके कदमों में लम्बलेट हो जाओगे और कहोगे- ‘‘तुम अब कहाँ थे गुरू।’’गुरू कहीं नहीं था। वो तो बस तुम्हारे इनव्हेस्टमेन्ट का इन्तज़ार कर रहा था। तुमने बीबी इनव्हेस्ट कर दी, तुमने बेटा इनव्हेस्ट कर दिया, तुमने प्रापर्टी इनव्हेस्ट कर दी, उसने तुम्हें बुद्ध बना दिया। तुम्हें समझा दिया कि तुम मन को पकड़ने का सार जान गये हो। जाओ-इस सर्टिफि़केट को अच्छी तरह मढ़वा कर अपने गले में टाँग लो। अभी तुम्हारे आगे-पीछे चेलों की भीड़ लगने वाली है इसलिये इसकेे पहले पास के मल्टीप्लेक्स में लगी ‘इन्सेप्शन’ देखकर घर जाना। सपने में सपना, सपने में सपना का मज़ा ले के जाना।ये सुविधा राम को नसीब नहीं थी भाई और ‘इन्सेप्शन’ जैसी फि़ल्म दस रूपये की सी.डी. पर कभी समझ में नहीं आयेगी तुझे। चार सौ रूपये का टिकट ले, तब तू मुहल्ले में जा के कह सकेेगा कि तुझे ‘इन्सेप्शन’ समझ में आ गई है।लोग पूछेंगे- ‘‘काहे का ‘इन्सेप्शन’? कहीं यह ‘कोन्ट्रासेप्शन’ की बड़ी बहन तो नहीं है?’’ तुम कहोगे- ‘‘नहीं यारों, ‘इन्सेप्शन’... ‘इन्सेप्शन’... माने... मल्टीप्लेक्स वाली ‘इन्सेप्शन’...’’ लोग कहेंगे- ‘‘धत्त तेरे की! ऐसा बोल ना कि ‘इन्सेप्शन’... देखा।’’ मल्टीप्लेक्स सुनते ही वे लोग भी समझ जायेंगे तू किस ‘इन्सेप्शन’ की बात कर रहा है और तू तो चार सौ का टिकट कटाते ही समझ गया होगा- ‘इन्सेप्शन’...!‘इन्सेप्शन’...! माने ‘इन्सेप्शन’...! और क्या!‘‘निर्मल अगस्त्य’’‘उपन्यास अंश’ ‘‘बस एक तीली’’ से

Sunday, November 16, 2014

‘‘मौत किश्तोें में’’

‘‘मौत किश्तोें में’’

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मेरे बुजुर्गों ने कहा, हमेशा ही कहा कि - ‘‘बीती ताहे बिसारिये, आगे की सुध लेय...!’’ बात अच्छी है, श्रवणीय है, पठनीय है। लेकिन क्या ये हर मसले में अनुकरणीय भी है? हम उस हर घटना को ज़रूर बिसार देने के पक्ष में हैं जो, हमारे साथ एक या दो बार घटती है। जिसको दिमाग की कोशिकाओं के पीपे में सोच की इंजाइम डाल कर सड़ाने से, फर्मेन्ट करने से कोई अल्कोहल नहीं बनता कि थोड़ा झूम लिया जाये। बल्कि ज़हर बनता है। लेकिन जो दुर्घटना हमारे साथ हर रोज घटे, उसे आप कैसे बिसार सकते हैं। अब ईश्वर ने दिमाग़ को इतने कन्ट्रोल दिये लेकिन शिफ्ट, अल्ट और डिलीट नाम का बटन तो दिया ही नहीं। उसकी मर्ज़ी। खिलौना है आपका, तो बटन भी है आपका।


सन 2014 का तीसरा नवम्बर। इन्कमटैक्स चैराहे पर एक धीमी गति से आ रहे बाईक सवार पर बगल में खड़े एक रिक्शे से सफ़ारी सूट पहना एक युवक कूद जाता है। गौरतलब यह है कि वह युवक दाहिनी तरफ कूदता है। अगर उस बाईक की जगह कोई तेज़ रफ़्तार से चार पहिये वाला वाहन आ रहा होता तो पुनः, जीवन में कभी उसे कूदने की ज़रूरत ही नहीं होती। वह बन्दा इस्केप वेलोसिटी यानी पलायन वेग के से कई गुना तेज़ गति से स्वर्ग को कूच कर गया होता। अब आप कहेंगे- स्वर्ग क्यूँ भईया? वो इसलिये कि उसके जैसे लोगों ने तो नागरिक जीवन और समाज को पहले ही नरक बना रखा है जिसमें, उसे जहाँ मन करे, जिधर मन करे, कूद सकता है। तो, नरक तो वह जी ही रहा है और बड़े मज़े से जी रहा है। अब जो आदमी नरक में मज़ा लेने कि काबिलियत रखता है उसे यमराज कदापि नरक में तो नहीं ही रखेंगे। इन जैसे लोगों को तो स्वर्ग में कष्ट होता है। जहाँ हर चीज सुव्यवस्थित हैं, सुन्दर है, शान्त हैं। हाँ, तो वह युवक गलत तरीके से दाहिनी तरफ एक बाइक सवार पर कूद गया। बाइक वाला लड़खड़ाया लेकिन उसकी रफ़्तार इतनी कम थी कि वह सम्भल गया। ये उसकी तकदीर थी कि ईश्वर ने उसके मन में अनार का रस पीने की इच्छा डाल दी और उसे भी वहाँ से लगभग दस कदम आगे बांये होना था जहाँ रिक्शा खड़ा था और जिस रिक्शे से युवक उसके ऊपर कूदा था। इसलिये भी उसकी रफ़्तार कम थी। अब ऐसे में नज़रें तो मिलनी ही थीं। बाईक सवार युवक को उम्मीद थी कि वह सफ़ारी सूट वाला युवक उसे हाथ के इशारे से साॅरी कहेगा। बन्दे को मालूम नहीं या भूल गया कि स्वर्गीय मुकेश गा के गये हैं - ‘‘आँसू भरी है, ये जीवन की राहें...’’ और एक सन्त कह गये हैं कि अपेक्षा ही सारे दुःखों का अनिवार्य और दीर्घकाल तक ठहरे रहने वाला कारण है।


तो अपेक्षा से दुःख तो होना ही था। वह सफारी सूट वाला युवक आगे तो चलता रहा लेकिन उसकी गरदन पीछे की ओर मुड़ी रही। वह बाईक वाले युवक को धाराप्रवाह गालियाँ देने लगा और घुम-घुम कर मुक्के और थप्पड़ दिखाने लगा।


बाईक वाला युवक हतप्रभ था। वह जोर-जोर से कह रहा था- ‘‘अरे भाई! ऐसे दाहिने तरफ कूदियेगा और उल्टे हम्हीं को गरियाईगा।’’ तब तक वह सफारी सूट वाला बीच-पच्चीस कदम आगे वहाँ पहुँच चुका था जहाँ एक सफेद कार लगी थी और उसमें कुछ युवक शराब पी रहे थे। सभी फल और ज्यूस दुकान वाले अपने-अपने काम में तल्लीन थे। बिल्कुल नई-नई ब्याही औरतों की तरह, सर झुका कर। बस घूँघट और खनकती चूडि़यों की कमी थी। और वैसे भी नोट वाले बाबा तो बोल ही गये हैं कि बुरा मत देखो और जो हो रहा था वह बुरा तो था ही। वह सफारी सूट वाला उस कार में घुसा और दस सेकेंड के बाद उसके साथ तीन और युवक कार से निकले। कमाल की स्क्रिप्टिंग होती है बाॅस! आप मानिये या न मानिये! जब-जब आप सही होते हैं, आपके सारे दोस्त कहीं गुनाहे अजीम कर रहे होते हैं। मय छलका रहे होते हैं। गाना सुन रहे होते हैं। माल में परिवार को तफरीह करा रहे होते हैं। और जब आप गलत होते हैं तो सारे मोगाम्बोज, लायन्स, डाक्टर डैंग्स और गजनीज आपके साथ होते हैं। बाइक वाला युवक पहले तो डरा, फिर आशा बंधी कि इन तीन नये बन्दो को तो बताया जा सकता है कि वास्तव में हुआ क्या था। यहीं तो इन्डिया मार खा जाता है। एक मिनट पहले अपेक्षा ने बाइक सवार युवक की भावनाओं और प्रतिष्ठा का कबाड़ा कर दिया था और वह फिर अपेक्षा कर बैठा। वह भूल गया कि ‘’मैन‘’ चड्डी को पैन्ट के भीतर पहनता है और ‘‘सुपरमैन’’ चड्डी को पैन्ट के बाहर पहनता है और जितने भी बैडमैन्स और मोगाम्बोज हैं वो न तो पैन्ट पहनते हैं और न ही चड्डी पहनते हैं। अब कायदे की बात तो यही है कि नंगे आदमी भला कपड़े पहने आदमी को क्यूँ अपना समझेंगे और क्यूँ उसकी बाद सुनेंगे। नंगे लोगों के लिये कपड़े वाला आदमी एक इन्सल्ट की तरह होता है। बताओ, हम नंगे होकर प्रकृति में समाहित हो रहे हैं और ये कपड़े़ पहन कर इसे अवरूद्ध कर रहे हैं। अरे! जीवन का मूल ही हिंसा है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति ही विस्फोट से हुई है।


सो हुआ विस्फोट!


बाइक वाला युवक इससे पहले की अपनी बात शुरू कर पाता, उधर से लात शुरू हो गया। आगे न ही जानिये तो ही अच्छा है। वही मेलोड्रामा, वही वन शाॅट, टू शाॅट, क्लोज, वाइड, वही रिप्ले एक्शन और वही बैकग्राउन्ड म्यूजिक।


फिर वे युवक एक तरफा फाईट सिक्वेन्स का शाॅट देकर चलते बने। अब बचा वो बाईक वाला युवक और करीब दो दर्जन फल और ज्यूस की दुकानें। अब दूसरा कमाल हम इन्सानों का, विशेष तौर से हम तथाकथित सेन्सिबल भारतियों का यह है कि घटना घट जाने के बाद, खास कर जब घटना दूसरे के साथ घटी हो, भीड़ का हर एक आदमी नानक बन जाता, बुद्ध बन जाता है, चाणक्य बन जाता है, विदुर बन जाता है। उसमें से एक ने कहा- ‘‘काहे ल इ सब से लग गये भईया। अरे! इ सब एम.एल.ए. फ्लैट का लईका सब है। यही कामे है ई सब का।’’


बाईक वाले युवक ने कहना चाहा कि वह कहाँ उलझा? उसने कहाँ गलत किया? तभी उसके दिमाग में बजा- ‘‘बाबू, समझो इशारे, हारन पुकारे, पम-पम-पम!’’ अब वह और अपेक्षा नहीं करना चाह रहा था।


तो ये बताया जाये कि इसको घटना को बिसार दिया जाना चाहिये या नहीं? अगर हाँ तो क्यूँ? क्या ऐसी घटना उस युवक के जीवन में दुबारा नहीं घटेगी या पहले नहीं घटी होगी? इस देश में मानवाधिकार का उल्लंघन जितने बड़े और ताकतवर आदमी नहीं करते उसका सौ गुना या हजार गुना उनके लगुये-भगुये, साले-बहनोई, बेटी-दामाद, बेटा-पतोहु, टेनी-स्टेपनी और चमचे-डब्बू करते हैं।


गाड़ी के पीछे पागलों की तरह हार्न बजाना जबकि सिग्लन बन्द हो और आगे एक सूत भी जगह नहीं हो। बिना किसी बात का गाली दे-देना और थप्पड़ चला देना। लाईन तोड़ कर आगे बढ़ जाना। अपने आकाओं के दम पर सामाजिक और मानसिक आतंकवाद फैलाना। साधारण आदमी, चाहे वह पैदल चलता हो या कार में घूमता हो, घर लौट कर पाता है कि आज उसकी बेईज्जती नहीं हुई तो उसे लगता है वह आज तो जी गया। इस देश में सही-गलत जैसी कोई चीज नहीं होती। जो होता है, स्थिति होती है, ताकत होती है, पैसा होता है।


आप लाख सही हैं, अगर अकेले हैं तो अदृश्य हैं, अश्रवणीय हैं, महसूस किये जाने लायक भी नहीं हैं। न तो कोई आपको देखेगा, न तो कोई आपकी सुनेगा। आप अकेले हैं, अहिंसक है और कमजोर हैं तो सारी दुनिया घूँघट में है। नोट वाले बाबा के सिद्धांतों पर अमल कर रही है। और अगर आप गलत भी हैं लेकिन मजबूत हैं, हिंसक हैं और मेजाॅरिटी में हैं तो हर कोई आपको देखेगा भी, सुनेगा भी और सहेगा भी। मैं जानता हूँ इस लेख को पढ़ के आप भी इस विषय को विसार देगें, लेकिन कब तक? ये घटना आपके साथ भी हो सकती है। जिनके साथ मेजाॅरिटी होती है, मजबूती होती, हैं हिंसा होती है, खून में पागल कुत्ते की लार होती है, गुणसूत्रों में कई बापों का डी.एन.ए. होता है, वो तो ऐसे लेख पढ़ने से रहे। सो बड़ा अजीब समीकरण है। आप पढ़ना नहीं चाहते या पढ के बिसार देना चाहते हैं और जिनकी वजह से मैं यह लिखने को मजबूर हुआ उन्हें पढने की जरूरत नहीं है। अब मैं समझ पाया कि आम, कमजोर आदमी सिनेमा डूब के, मगन को के क्यूँ देखता है? वो इसलिये कि सिनेमा में ठीक इसका उल्टा दिखाया जाता है जहाँ एक लुचुर-पुचुर, सिंगल सिलेंडर, 50 सी.सी. इंजन वाला हीरो, दर्जनों हृष्ट-पुष्ट, आठ सिलेंडर और 1000 सी.सी. वाले मोगाम्बोज को उड़ा-उड़ा के पटक-पटक के, रगड़-रगड़ के धोता है। हम कमजोर लोग किताबों, फिल्मों और ख्वाब में जिन्दा हैं और जिन्दगी में बस चलते-फिरते मुर्दे हैं जिन्हें एक दिन पूरी तरह मर जाने के बाद बड़े सम्मान और प्यार से याद किया जाता है।


‘‘निर्मल अगस्त्य’’


4 नवम्बर 2014


पटना

Wednesday, November 12, 2014

"कभी-कभी"


कभी-कभी हम उतना नहीं जी पाते 
जितना,
कहीं किसी मोड़, किसी गली 
या किसी दरवाज़े से होकर 
गुज़रते हुए जी जाते हैं। 
चाँद में छिपी चवन्नी,
सूरज में दबी अठन्नी,
बादलों में तैरता बताशा,
एक टिकोले को टटोलती 
गुलेल की लचकती सी आशा !
भीड़ के आप-धापी में 
मुस्कुराता एक चेहरा,
किसी के होने से पहले
अपनेपन का घेरा,
हर इन्सान बस एक ख़्वाब है 
जो किसी की नींद में उतर तो सकता है,
जी नहीं सकता!

तब भी यही होता है 
कि हम उतना
जग के नहीं जी पाते, 
जितना ख़्वाब में जी जाते हैं। 

पन्द्रह पैसे का पोस्टकार्ड, 
चार आने की अन्तर्देसी और 
एक रुपये के लिफ़ाफ़े में 
शब्द नहीं जाते थे कभी,
एहसासों से बुनी हुई 
ज़िन्दगी जाती थी 
जिसका एक सिरा 
चिठ्ठी भेजने वाले के हाथ होता था 
और एक सिरा 
चिठ्ठी पाने वाले के हाथ।  
हम बोल के कहाँ उतना कह पाते हैं 
जितना लिख के कह पाते थे। 

बड़ी ख़ुशी होती है 
जब कोई 
बड़ी देर तक घन्टी बजने के बाद फ़ोन उठाता है,
और जम्हाई ले-ले कर देर तक बतियाता है। 
जब दिल बड़ा हो 
तो बिल कम लगने लगता है और जब 
दूरियाँ बहुत छोटी हों 
तो बैलेंस बड़ा लगने लगता है। 
कभी-कभी हम उतना नहीं समझ पाते 
जितना दिल चुपके से समझ जाता है। 
कभी-कभी हम शब्दों को उतना नहीं पढ़ पाते
जितना वे कहना चाहते हैं,
लेकिन हम उन्हें पढ़ के अक़्सर 
वहीँ छोड़ आते हैं। 
और जो पढ़ना बाक़ी रह जाता है 
वही अलफ़ाज़
मन में बस जाते हैं।    

"निर्मल अगस्त्य"

Sunday, May 11, 2014

“DISCOURSE”

Your eyes are beautiful!

I said…
It’s illusion of your eyes!
She said…
Your hairs are cloudy black!
I said…
There is darkness in your mind!
She Said…
You are the center of my imagination!
I said…
I am out of periphery!
She said…
You are the factorization of my emotional being!
I said…
You have forgotten mathematics!
She said…
I am in Love with you!
 I said…
Then I will say it importunateness!
She said…
Don’t you Love me!
I almost clamored and eyes were wet.

And for my Love she became dumb forever. 

Saturday, May 10, 2014

“GENERATION GAP”


Some years back 
Dad got me about 
Half score of homologous bottles 
Spilt with paint 
Thick and viscous 
Batter of their soul 
Overthrown, and all over my heart 
Treading with 
Heavy feet of imaginative phrase. 

Mom designed 
A pair of paint brush 
From the pile of 
Dried China-Rose shrub. 
Both of them found some canvas 
Murky, misty and smeared in dole 
Slept from years 
Inside the dark of an ageing chest. 

They inspirited me 
To enjoy fauvism and paint anything--- 
Anything beautiful and distortion free. 
I scribbled 
Many a thick lines, 
They laughed on it 
Kissed my forehead more often 
Ageing beside me and beneath their thought. 

Crept the days 
Evolving in me, 
Bottles condensed less ordinary viscous 
More darken tint. 
I wanted colours of my transient choice 
But the bottles two decades old 
Emerged a bone of passive contention. 

One day dad mentioned a pastoral calm 
That night I painted a huge boxing ring. 
Mom wished, plush blue bedroom 
And a waterfall 
Tranquil and sombre. 
I painted a semi-dark casino 
And a big asteroid falling on earth, 
Hitting a chopper. 

She clamoured for a frame 
Breathing in breast 
And sleeping in a pair of 
Rosy lips. 
I emerged with hunting lion 
And scavenging vultures. 

It was the height of 
Unsatisfying discontentment 
When I painted 
A robust black horse 
Fast and furious 
Strong and determined, 
While they had requested 
For A red holy Cow 
Feeding her calf. 

A few days before 
They had a treaty 
To hold the fort 
Command in a high shrill voice 
To paint a donkey, tame and stake. 

I painted a phoenix 
With the head of an eagle 
And torso of a panther 
Limbs of an orang-utan 
And feet of a squid. 

And they burnt the canvas 
In a fit of rage 
Broken all brushes 
Disposed of all emulsions 
In the deep of a sewer. 

Annoyed and torched 
I made a canvas 
From the skin of my zeal 
Allowed few ounce of blood 
To leave the arteries 
And I painted their voice 
A red holy Cow 
With her calf of their choice. 

In the same rebel night 
The cow broke the stake 
And absconded with her calf 
And my parents 
Who went for a search 
Are still missing with 
Their deceptive laugh.

      **************

“DEFEAT”

No one could take away

My right to Love
And the strength
Originated from that
                         ……. Love!
God reflected his beauty
From her body
From her presence,
Constrained with
                           …….boundaries!
I could see his defeat who was
Standing like a guilty
Near the fence,
And head down….
                             …….Limitation!
Where my soul hovers
With the Love that always wins,
Which I created.
And with the body that always loses,

                        ……..Which he created!

Sunday, January 19, 2014

वो दुनियाँ अगर ---

वो दुनियाँ---
विश्लेषण की कैंची से परे!
तर्क के सैंड पेपर से
दूर हम खड़े,
जो था बस कल्पना थी---
मन था--- सपने थे।

जहाँ परियाँ थीं झूलों पर
बोतल में बंद जिन्न था,
भूत, पिशाच, अमावस की रात में
रोटी-प्याज माँगने वाली बुढ़िया
और झाड़ू पर  उड़ने वाली चुड़ैलें थीं।

बचपन की वो दुनियाँ
जो पीछे छूट गयी
कहानियों वाली दुनियाँ!
कॉमिक्सों वाली दुनियाँ!
रेडियो अख़बारों वाली दुनियाँ!

वो गुड्डे-गुड़ियों की शादी की दुनियाँ
वो परियों की कहानियों की दुनियाँ,
वो शरबत की दुनियाँ
जिसके लिए  निम्बू
बड़ी बहादुरी से चुराये थे हमने।

वो पहली-पहली बार पिकनिक की दुनियाँ
जिसके लिए चूल्हे जलाये थे हमने,
वो पुड़ी जो कच्ची भी पक्की भी प्यारी थी
वो सब्ज़ी जो हम मिनटों में चट कर जाते थे,
फिर बर्तनों से टन-टन लड़ाई की दुनियाँ।

वो काग़ज़ी बन्दूकों से ढिच्क्यों का खेला
वो दुर्गाबाड़ी में चैती-दुर्गा का मेला
उस मेले में संवरकी के बेर की चटनी
खिचड़ी के परसाद के लाइन का रेला,
वो पानी में कमसिन मूछों की दुनियाँ
वो मूछों में सनसनाती पानी की दुनियाँ,
वो दुनिया तुम्हारी थी वो दुनियाँ थी मेरी
कहाँ छोड़ आये चकल्लस की दुनिया।

(मेरे कविता संग्रह - "इसी कुछ में" से )






Thursday, January 9, 2014

एक था. . . 

एक था कभी-
भीतर की तरफ़ मुड़ा हुआ,
एक मुट्ठी आसमान लेकर
निकल पड़ता था रोज़ सवेरे।

जब सारे शहर में
दिनचर्या की प्रार्थना गूँजती थी
वह शहर के अंतिम छोर पर
किसी बेनाम खंडहर की दीवारों को
माउथ-ऑर्गन सुनाया करता था,
एक मुट्ठी आसमान
छुई-मुई के पत्तों को ओढ़ा कर।

पुनः जब शहर
थपकियों के संगीत में
हौले-हौले हिल रहा होता
वह लौट आता था, चुपचाप!
उस एक मुट्ठी आसमान में
एक चुटकी सूरज छुपा कर।

एक था कभी-
जिसने चिड़ियाँ को
नर्गिस में बदलते देखा था शायद,
जिसने निर्वासित गायों को
कई बार घास के मैदान में
ले जा के छोड़ा था,
उसके कपड़े
बहुत साफ़ तो नहीं होते थे लेकिन
उसे गन्दा भी नहीं कहा जा सकता था,
सब की तरह वह
चप्पल भी पैरों में ही पहनता था,
थोड़े बहुत आलाप-तान के गुनगुनाहट
में तो रहता था वो
लेकि किसी ने उसे मन्त्रोच्चार करते
नहीं सुना था,
फिर भी लोगों की हुनर से
पागल था, सनकी था, औघड़ था।

उसने नदी की लहरों पर
चित्रकारी की थी,
पेड़ों को कवितायें सुनाई थी,
उसने तितलियों का
नृत्य भी देखा था शायद,
उसकी  चर्चा होती रहती थी
लेकिन वह ख़बरों में तो कहीं नहीं था!

और एक दिन वह
अचानक लापता हो गया!
फिर धीरे-धीरे
घर ख़र्च के हिसाब की कॉपी में
बच्चे की स्कूल की डायरी में
पत्नि के श्रृंगार सामग्री की सूची में
पिता के राम नाम लिखने वाले पत्ते में
माँ की पूजा के लिए
बेलपत्रों और आम्रपल्लवों की हरियाली में
रिश्तेदारों की शिकायतों की पोटलियों में
फ़ेमिली डॉक्टर की पर्चियों में
और जन्मोत्सव से श्राद्ध तक के आमंत्रण पत्रों में
उसके टुकड़े मिले!
एक था कभी-    

Sunday, January 5, 2014

"मेरी उम्र की दीवार पर "

आओ ---
तुम भी लिखो,
मेरी उम्र की दीवार पर।

मेरी उम्र
जो गुज़रती गयी दर-बदर,
कैसे बयां हो?
कि बस एक दीवार है
जिसपे पहली बार
कुछ बीस बरस पहले
लिखा था किसी ने-
"मुझे तुमसे प्यार है !"

वो तहरीर, वो लिखावट
और वही दीवार,
 दर-बदर!
ये कैसे बयां हो?

यूँ ही साल दर साल
लिखते रहे लोग
मेरी उम्र की दीवार पर,
अपना नाम और
मेरा नाम,
कुछ दिल की आकृति से घेरों में,
जो टूटे
तो टूटे बस उनके लिए।

नाम मेरा रहा
उसी  दिल की आकृति में
ख़ामोश!
जैसे मेरी उम्र की दीवार
रह गयी ख़ामोश
दर-बदर गुज़रती हुई।

सब उसी यक़ीन से
निशानी छोड़ आये
कि जैसे लिखावट और वादे
एक ही चीज़ हों,
बस मेरी उम्र जानती है
और उम्र की दीवार
कि बस लिखावट
रह गयी है बाकी
अब वादे कैसे बयां हो।

तुम ख़ुद को देखो
तो तुम
नयी-नयी आयी हो,
मैं ख़ुद को देखूँ
तो तुम नयी नहीं आयी हो
जो इतनी  संजीदा हो!
और दूर-दूर सहमी-सहमी सी
जैसे बारिश में भींगती।
एक बार तो लिख कर देखो-
अपना नाम, फिर मेरा नाम
दिल की आकृति से घेरों में।

दीवारों से क्या रिश्ता
उम्र से क्या नाता,
और ऐसे भी बीतती है
तो बीतने दो,
ये मेरी उम्र है!
तुम बस लिखो
कि दो कदम पे तक़ल्लुफ़ है
और दो हाथ पे स्याही
मेरी उम्र की दीवार पर तुम भी,
तुम भी अपना नाम लिखो,
और वादे?
वादे तो भूल जाने का
मुकम्मल सामान हैं।

दिल की आकृति से घेरों में
एक इबादत तुम भी लिखो
मेरी उम्र की दीवार पर,    
तुम भी लिखो
बस उसी यक़ीन से,
तुम भी लिखो
उसी शिद्दत से,
निशानी छोड़ कि तहरीर और अहद
एक ही तो चीज़ है।
घेरों की परवाह
तुम्हे क्यूँ कर हो,
वैसे भी अब तक उन घेरों में
उन दिल की आकृति के घेरों में
बस मेरा नाम ही बाकी है,
मेरी उम्र की दीवार पर
गुज़रती आ रही है जो,
दर-बदर!
ये कैसे बयां हो।           

Friday, December 27, 2013

"इन्हें अकेले लौटने दो"

नज़रें हैं,
नज़रों को बहानों के सहारे रखना
बिलकुल ख़ामख़याली वाली बात है।

कोई किसी को देखता है
और यह क़तई ज़रूरी नहीं
कि घर बसाने के लिए ही देखता हो।
हालाँकि घर बसाने का मसला
देखने से शुरू तो हो ही सकता है
लेकिन सिर्फ़ देखने भर से शुरू हो
यह ज़बरदस्ती है।

नज़रें  तो,
आसमान भी देखती हैं
दरख़्त भी देखती हैं
श्मशान भी देखती हैं,
नजरें ही हैं
इन्हें जाने दो,
चेहरे हैं
इन्हें भी आने-जाने दो,
कहानियाँ क्या गढ़ना
रोमांच के साथ
क्यूँ धक्कामुक्की करते हो।

उसके लिए भीड़ है
क़तारें हैं
मंदिरों-मस्जिदों और
शराबखानों की सीढ़ियाँ हैं,
किस-किस को घर लाओगे
किस-किस के साथ घर बसाओगे
कितनों के साथ बंधोगे
कितने रिश्तों को सहेजोगे।

सड़क को, पेड़ों को, तारों को
ठेलागाड़ी, चकाचौंध, ठेलम-ठेल
दुआ-सलाम, रफ़्तार-विराम, भीड़ को,
चौराहों को, इशारों को, विचारों को,
इश्तेहारों में भटक गए गलियारों को
घर के भीतर कैसे जियोगे।

इन्हे वहीं छोड़ के आ जाते हैं हम
अपने-अपने जड़त्व के साथ,
फिर चेहरे क्यूँ ले आते हैं हम
रिश्ते जमाने के लिए
पन्नों और तस्वीरों वाली अलबम पर
निभाने के लिए,
कोई किसी को देखता है
तो सम्भव है बस
देखने भर के लिए देखता हो।

नज़रें ही हैं,
इनके अस्तित्व को
ख़ामख़ा के हवाले मत करो,
ये जैसे जाते हैं
वैसे ही इनको
अकेले लौट आने दो।    

Saturday, July 27, 2013

मैं वक़्त से कहता हूँ.

मैं वक़्त से कहता हूँ ,
गाहे-बगाहे तू भी फ्लश चला लिया कर!
वो दो साल पहले जो
आवाज़ में आसमान घोल के गाती थी,
उसकी निगाहों में मोच आ गयी है.
जबकी मैं उसकी ओर बढ़ता हूँ तो वो समझती है
मैं बेशरम सा वहीं खड़ा कोई मफ़लर हिला रहा हूँ .

वो दरिया के किनारे जिस स्कूल में मैंने
पहली बार इन्सान को  मुर्गा बनते देखा था,
वहीं जहाँ टिफ़िन के समय हम अपना पेट लंच से कम
और शेह्तूतों से ज़्यादा भरते थे-
उस स्कूल की जगह कब का सुपर मार्केट बन गया.
सुना है वो चाट वाला भी मर गया
जिसके पैसे हमने अब तक नहीं चुकाए।

ऐसे ढेरों किस्से हैं , भरे-भरे!
लवनी के लवनी टंगे
भूत के ताड़ों पे और
मैं वक़्त से कहता हूँ ,
गाहे-बगाहे तू भी फ्लश चला लिया कर!

इतना सा ही उधार तो रह गया है
कि पूरा जीवन उधार हो गया है,
बेशर्मी के शेह्तूत, डाल-डाल, पोर-पोर खिले हैं.
कुछ इसी महीने के हैं - हरे-हरे! कच्चे !
जिसे पाने की उधार की आस में
मैं स्टेव पर कुछ क्रोशे, कुछ मिनम
और कुछ सेमी-क्वेवर बो रहा हूँ,
उस गायिका के सुरों से भी ज़्यादा खट्टे
कुछ सूर्ख़! पके! रस भरे!
पिछले महीनों के.

अब तो आती हुई साँसों को भी कहता हूँ -
कि दे जाना है तो दे जाओ
लौटा नहीं पाउँगा,
इसलिए मैं वक़्त से कहता हूँ कि
गाहे-बगाहे तू भी फ्लश चला लिया कर!

पुल के नीचे से ट्रेन बस गुज़र रही है
और दिल्ली का ये ट्रिप, दोस्त के लिए शादी का उपहार
सब निपट रहा है
एक और शेह्तूत के हरे गुच्छों से.
तिलक ब्रिज पर गाडी थोड़ी धीमी हो रही है,
हो सके तो मेरे लौटने के पहले
एक बार फ्लश चला ले.
तेरी आस में टँगी लवनियाँ
हवा के हिलकोरे पर
डुबुक-डुबुक करती हैं
या पता नहीं मुझे डूब जा-डूब जा कहती हैं.
मैं वक़्त से कहता हूँ ,
गाहे-बगाहे तू भी फ्लश चला लिया कर!


Thursday, March 15, 2012