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Thursday, January 9, 2014

एक था. . . 

एक था कभी-
भीतर की तरफ़ मुड़ा हुआ,
एक मुट्ठी आसमान लेकर
निकल पड़ता था रोज़ सवेरे।

जब सारे शहर में
दिनचर्या की प्रार्थना गूँजती थी
वह शहर के अंतिम छोर पर
किसी बेनाम खंडहर की दीवारों को
माउथ-ऑर्गन सुनाया करता था,
एक मुट्ठी आसमान
छुई-मुई के पत्तों को ओढ़ा कर।

पुनः जब शहर
थपकियों के संगीत में
हौले-हौले हिल रहा होता
वह लौट आता था, चुपचाप!
उस एक मुट्ठी आसमान में
एक चुटकी सूरज छुपा कर।

एक था कभी-
जिसने चिड़ियाँ को
नर्गिस में बदलते देखा था शायद,
जिसने निर्वासित गायों को
कई बार घास के मैदान में
ले जा के छोड़ा था,
उसके कपड़े
बहुत साफ़ तो नहीं होते थे लेकिन
उसे गन्दा भी नहीं कहा जा सकता था,
सब की तरह वह
चप्पल भी पैरों में ही पहनता था,
थोड़े बहुत आलाप-तान के गुनगुनाहट
में तो रहता था वो
लेकि किसी ने उसे मन्त्रोच्चार करते
नहीं सुना था,
फिर भी लोगों की हुनर से
पागल था, सनकी था, औघड़ था।

उसने नदी की लहरों पर
चित्रकारी की थी,
पेड़ों को कवितायें सुनाई थी,
उसने तितलियों का
नृत्य भी देखा था शायद,
उसकी  चर्चा होती रहती थी
लेकिन वह ख़बरों में तो कहीं नहीं था!

और एक दिन वह
अचानक लापता हो गया!
फिर धीरे-धीरे
घर ख़र्च के हिसाब की कॉपी में
बच्चे की स्कूल की डायरी में
पत्नि के श्रृंगार सामग्री की सूची में
पिता के राम नाम लिखने वाले पत्ते में
माँ की पूजा के लिए
बेलपत्रों और आम्रपल्लवों की हरियाली में
रिश्तेदारों की शिकायतों की पोटलियों में
फ़ेमिली डॉक्टर की पर्चियों में
और जन्मोत्सव से श्राद्ध तक के आमंत्रण पत्रों में
उसके टुकड़े मिले!
एक था कभी-    

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