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Monday, October 9, 2017

IF MY HEART IS A RADIO

If my heart is a radio 
I’ll catch you every morning, through the wave. 
Pulling up my mind to the raindrops 
I’ll sing you as a song through the wave. 
Its new time of taking up the tuning my heart 
It’s a new dimension of the purest trust. 
That my heart is radio and you are a song!

If my heart is a radio 
I’ll catch you every morning through the wave. 
The Sun and the Moon will pass through the globe 
and I will walk in the woods away from noise, 
The joy of talking with the dense forest 
I‘ll be living through a tranquil poise. 

If my heart is a radio 
I’ll catch you every morning through the wave, 
Pulling up my mind to the world of stars 
I’ll sing you as a song through the wave. 
Its new time of taking up the tuning my heart 
It’s a new dimension of the purest trust, 
That my heart is radio and you are a song!


             ******* 
Nirmal Augastaya

Friday, April 29, 2016

"मेरे लिए मृत्युश्लोक मत पढ़ना"

शायद मेरे तेवर कुछ अलग होंगे 
शायद मेरी आवाज़ भी कड़ी होगी 
शायद मैं वो श्लोक नहीं सुन पाऊँगा 
जो ठीक मरने के पहले सुनाया जाता है 
शायद मैं उस भगवान् का नाम भी न ले पाऊँगा 
जिसे, मुझे मानना सिखाया गया है।  


ऐसा नहीं है कि मैं 
भीड़ की तरफ़ नहीं देखूँगा 
उस नपुंसक भीड़ की तरह
जो नियोग विधि से 
छन भर में जनम कर सुरसा हो जाती है। 


मैं कोई क़वायद नहीं हूँ 
न ही कोई फरयादी हूँ 
जिनके लिए मौन एक संस्कार है 
सजदा एक धर्म है,
मैं किसी के लिए नहीं लिखता 
न दाम के लिए, न वाम के लिए 
मेरी जगह बस्तियों और महफ़िलों में नहीं है 
जहाँ मुर्दे अपनी अपने ख़्वाबों को नज़रबन्द कर 
ख़्वाबों पर ही कवितायेँ सुनाते हैं। 


मेरे ठीक मरने के पहले सबको हक़ है 
कि वो मेरी लाश के पास आयें 
ऐसा चेहरा लिए मानो वो मुझे 
पहचानते भी हैं और नहीं भी पहचानते हैं
अगर सांस बाक़ी रही 
तो मैं भी उन्हें देख कर 
व्यंग्य से हसुँगा 
और आवाज़ निकल पायी तो कहुँगा 
कि देखो, हाँ देख लो 
कि मेरा एक हाथ उस सुराख़ पर है 
जिसमे अभी अभी  
अपनी कुंठा निकलने के लिए 
भीड़ ने बन्दूक से हस्तमैथुन किया है 
और मेरा दूसरा हाथ उस कलम पर है 
जिससे मैं हमेशा मौत की कविता 
ज़िन्दगी की स्याही से लिखता आया हूँ। 

"निर्मल अगस्त्य"
01:04 PM, 29/04/2016
पटना, बिहार। 

Saturday, January 10, 2015

"प्रेम को क्या चाहिये"


जैसा भी और जितना भी है आसमान!
गोल, सपाट, किनारों पर झुका हुआ।
एक बिस्तर भर या थाली भर,
या जितना क्षेत्रफल ललाट का है
कम से कम उतना ही सही!
प्रेम पर लिखने के लिये तो काफी ही है।


और वैसे भी प्रेम पर
कोई इससे ज़्यादा क्या लिख सकता है,
एक अपने और एक उसके नाम के अलावा।
हालाँकि, प्रेम अगर वास्तव में है
तो नाम लिखना भी कोई विशेष उपक्रम नहीं है।


जैसा भी और जितना भी है आसमान!
फैला हुआ या बहता हुआ,
या उस वक़्त तक ठहरा हुआ
जब तक हम इसकी तरफ देखते रहते हैं।
उसमें जितना भी नीलापन है,
यहाँ से वहाँ तक लगातारपन की आभा
और जितनी जगह वो निकाल सकता है,
ले तो आता ही है प्रेम के लिये।


चाहे वो तुम्हारा हो, मेरा हो
या किसी और का हो।
इसमें कोई संशय नहीं
कि स्वीकृति अच्छी बात है
लेकिन क्या इतना
कि आसमान पर ठप्पा लगाने से बचा न जा सके।


दो नाम या दो शब्द की बात नहीं है,
बात सांकल और सिटकनी की है।
आसमान चाहे जितना भी है,
उसे आसमान बने रहने का पूरा अधिकार है।
उसमें सांकल और सिटकनी लगा कर
दरवाज़ा बना देना घोर अन्याय है।
तुम प्रेम के बारे में, अपने बारे में,
उसके बारे में एक बार और विचार कर  देख सकते हो
कि उसे क्या चाहिये,
विस्तार या दरवाज़ा ?

निर्मल अगस्त्य।
 .......

Thursday, January 8, 2015

‘‘खोंचर कीजिये, सुख से रहिये’’


   
न्सान और जानवर में अनगिनत अन्तर है और उन सबों में से एक है खोंचर करने की योग्यता जो हर इन्सान में अनिवार्य रूप से मौजुद है। लेकिन इस योग्यता का प्रभावी होने के लिये आपके ग्रे-मैटर में इसके कीटाणुओं का न्युनतम संख्या में होना आवश्यक है। विज्ञान के हिसाब से थ्रेशहोल्ड अॅमाऊन्ट। अब जैसे ई.कोलाई और बी.कोलाई के कीटाणु हमारे शरीर में एक न्युनतम संख्या से ऊपर होने के बाद ही रोग के लक्षण प्रगट करने की क्षमता रखते हैं तो एक सफल ‘खोंचरिस्ट’ बनने के लिये यह नितान्त आवश्यक है कि आपके ग्रे-मैटर में इसके कीटाणुओं की संख्या थ्रेशहोल्ड अमाउन्ट से बहुत अधिक हो। यह एक देशी शब्द है। इसकी उत्पत्ति  शायद ‘खोंच’ या ‘खरोंच’ से हुई हो सकती है। खोंच लगना, खोंच लग गया, कुर्सी खोंचहा हो गया है... इत्यादी। ये सब अपने बिहार के बहुत से जिलों के लोगों के कहते सुना होगा। ऐसी कोई भी नुकीली या कंटीली वस्तु जो आपके शरीर, कपडे़ या किसी भी वस्तु में खरोंच डाल सके, खोंच देने वाली खोंचहा कहलाती है। यहाँ पर यह संज्ञा है। लेकिन जब हम कहते हैं खोंच लग गया तब यहाँ यह विशेषण है जैसे दर्द हो गया में दर्द विशेषण है और घाव लग गया में घाव संज्ञा है। अब बात रही खोंचर करने की, तो जब यह खोंचहा वस्तु जो एक देशी टूल है, को किसी चीज को खरोंचने के लिये उपयोग में लाया जाता है तो उसे खोंचर करना माना जा सकता है। हालाँकि यह शब्द ‘खोंच’, ‘कोंच’ शब्द के काफी नजदीक है लेकिन दोनों में बहुत अन्तर है। कोंच देने का मतलब होता है अन्दर तक ठूँस देना। अब तीस सीट वाली बस में नब्बे लोग आप बिठा तो नहीं सकते। तब कोंच देना नाम की इस तकनीक का सफलतम प्रयोग जनसंख्या के उच्च घनत्व वाले इलाकों में हमेशा ही किया जाता है।
जबकि खोंच हमेशा ऊपरी सतह पर लगाया जाता है। आपने अपने जीवन में भी इसे किसी न किसी रूप में महसूस किया होगा। कभी काँटों की वजह से, कभी किसी पुरानी कुर्सी में बेहया की तरह पूँछ की तरफ से निकल आये किसी कील की वजह से तो कभी बाँस या लकड़ी में कहीं पर आवारा की तरह निकल आये मोटे रेशे की वजह से। इस खोंच का हाफ ब्रदर है ‘काँप’। यह काँपने वाला काँप नहीं है। जब भी किसी लकड़ी अथवा बाँस की बनी वस्तुओं, जैसे सूप, डगरा की कमानी से कोई टुकड़ा चमडे़ को खरोंचता हुआ अंदर घुस जाये और घुसा रह जाये तो उसे कांप लगना कहते हैं। कुछ लोग, खास कर शहर में रहने वाले लोग जो घरेलू भाषा का प्रयोग नहीं करते हैं, सवाल उठा सकते हैं कि इसे गड़ना या धसना क्यूँ नहीं कह सकते। वो इसलिये नहीं कह सकते कि गड़ने या धंसने की प्रक्रिया में वस्तु माँस में घुस जाती है जबकि काँप लगने की प्रक्रिया में वस्तु चमडे़ में फंस के रह जाती है। दूसरी मुख्य बात यह है कि काँप लगने में वस्तु चमडे़ के समानान्तर होती है जबकि गड़ने या धँसने में वस्तु माँस के लम्बवत भी हो सकती है, तिरछे हो सकती है और समानान्तर भी।
तो खोंच लगने का मतलब आप समझ गये। ऊपरी क्षति, कम नुकसान, घाव भरने में कम वक्त लेकिन बेचैनी और छटपटाहट काँप लगने और गड़ने-धँसने से ज्यादा। काँप लगने और गड़ने-धँसने के बाद अगर किसी महीन चिमटे या सुई की नोक से उस वस्तु को निकाल दिया जाये तो दर्द एकदम छू-मन्तर हो जाता है लेकिन खोंच लगने के बाद आपको तबतक दर्द सहना है जब तक घाव भर न जये। अब आप में से कुछ पाठक मुझसे सवाल कर सकते हैं कि अगर छूरा या गोली धंस जाये तब यह विश्लेषण तो ’आप’ की दिल्ली सरकार की तरह धराशायी हो जायेगा। तो बन्धू, आप सवाल नहीं कर रहे हैं बल्कि खोंचर कर रहे हैं। बात को समझ के भी काटने की कोशिश करने की प्रक्रिया भी, खोंचर करना कहलाती है। आप के घर में शादी-विवाह, छठ्ठी-छिल्ला इत्यादि का उत्सव तो होता ही रहा होगा। आप इन मौके पर ऐसे प्राणियों को बहुत आसानी से ढूँढ़ सकते हैं जो खोंचर करने में एक्सपर्ट हों।
हमारे यहाँ विवाह समारोह में रिश्तेदार तीन-चार दिन पहले से आने लगते हैं। इक्कीसवीं सदी में यही एक आराम मिला है हम सभी को कि अब लोगों के पास उतना समय नहीं है अन्यथा बीसवीं सदी के अन्तिम दशक तक रिश्तेदार एक महीना पहले ही आ जाते थे। तो इतने लोगों का खाना बनाने के लिये किसके घर में बर्तन रहेगा भला। तो जाहिर सी बात है लोग हलवाई रखते हैं। ये घरभोज या घरभैया भोज वाले हलवाई कहलाते हैं। हालाँकि घरभोज को गृहप्रवेश का भोज भी कहा जाता है तो आईये घरभैया भोज से काम चलाते हैं। अभी इनका रेट पाँच सौ रूपये प्रति आदमी से लेकर नौ सौ रूपये तक है। प्रति आदमी का मतलब खाने वालों की संख्या से नहीं बल्कि हलवाई और उसके कारीगरों की संख्या से है। अब पाँच दिन या एक सप्ताह कोई भी न तो छप्पनभोग खा सकता है, न खिला सकता है तो भात, दाल, भुजिया, दो तरह की घरेलू स्टाईल की सब्जी, चोखा-चटनी, पापड़-तिलौड़ी खिलाने के लिये कैटरर को बुक करना तो बेवकुफी है। तब ऐसे घरवैया भोज वाले हलवाईयों को काम पर रखा जाता है। अब इतने रिश्तेदारों में वो खोंचरिस्ट कहीं न कहीं इस मौके का इन्तजार कर रहा होता है जो अगर जवान हो तो यू-ट्यूब पर संजीव कपूर, तरला दलाल और निशा मधुलिका सरीखे नामचीन विशेषज्ञों का वीडियों देख कर वर्चुअल हलवाई बन चुका होता है और अगर बूढ़ा या अधेड़ हो तो अपने उम्र से बीस गुना भोजों में खा चुका होता है। अब उनकों भी पता है कि उनकों आलू-गोभी का दम, बिरयानी और राजभोग बनाने के लिये नहीं रखा गया है, फिर भी बैठ जायेंगे स्टूल लगा के गैस सिलिन्डर के पास और लगेंगे खोंचर करने।
अच्छा केसर कहाँ से खरीदते हो भाई। आजकल केसर के नाम पर एसेंस में डुबाया हुआ, धोती रंगने वाला चम्पई रंग से रंगा हुआ दूब्बी बिकता है बजार में, समझ कि नहीं। अच्छा छीलने के बाद प्याज धोये की नहीं। देखो, छौंकने समय तुमलोग मेथी पहले डालते हो और जीरा बाद में इसलिये तुमलोग का बनाया खाना घर जैसा नहीं लगता। सुनो, मसाला पिसवाओगे त हमको बुला लेना, हम बतायेंगे कि केतना-केतना पडे़गा। अच्छा, चायपत्ती उधर ठोंगा में काहे रखे हो जी। चायपत्ती हमेशा स्टील के डिब्बा में रखा जाता है। वगैरह-वगैरह। कुछ देर में हलवाई को विश्वास होने लगता है कि वह चोखा बनाने लायक भी नहीं है। ऐसी हजारों बातें होती हैं शादी-विवाह और किसी उत्सव वाले घर में। ऊपर तो मैनें बस कुछ सैम्पल लिखा है क्युँकि हर किसी को ऐसे खॉंचों से गुजरना पड़ता है और आप सब भी ऐसी खोंचर करने वाली बातों से पूर्णतया परिचित होंगे।
अपना रोजगार कीजिये तो नौकरी करने वाले दोस्त, रिश्तेदार आपको खोंचर करेंगे। नौकरी कर लीजियेगा तो अपना रोजगार करने वाले दोस्त, रिश्तेदार आपको खोंचर करेंगे। अगर आपका भूगोल अच्छा है तो इतिहास वाला मास्टर खोंचर करेगा। अगर आपका सारा विषय अच्छा ह तो आर्ट एन्ड क्राफ्ट, पी.टी. और स्पोटर्स टीचर आपको खोंचर करेगा।
आप रोग से बच सकते हैं। दुश्मन से बच सकते हैं। यहाँ तक कि पाकिस्तान से भी बचे रह सकते हैं लेकिन खोंचरिस्ट से नहीं बच सकते क्योंकि ये आपके बेहद करीब के लोग होते हैं जिन्हें पलटवार कर सबक सिखाने का जोखिम आप नहीं ले सकते। अगर आप बेटी का ब्याह आई.ए.एस. अधिकारी से ठीक कर दीजिये तो बैंक में काम करने वाले रिश्तेदार खोंचर करेंगे। बेटे का ब्याह किसी दूसरे जिले में ठीक कर दीजिये तो जिन्होंने अपने बच्चों का ब्याह अपने ही जिले में कर दिया है वो आपको खोंचर करेंगे। अगर आप स्कूटर खरीद लाईयेगा तो बाईक चलाने वाले खोंचर करेंगे और अगर आपने जिम जाना शुरू कर दिया तो योगा क्लास वाले खोंचर करेंगे।
मोटा-मोटी यह विशेष योग्यता विकासशील देशों के लोगों में पाई जाती है। इसका जात, धर्म, लिंग, वर्ग  और उम्र से कोई लेना देना नहीं है। अपने भारतवर्ष को ही ले लीजिये आप। खोंचर करना एक सर्वव्यापी आचरण है। भारत का नागरिक खोंचर किये बिना रह ही नहीं सकता। पचपन प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है और सालों भर खेती आप कर नहीं सकते। जब खेत में पहले से ही फसल लगी हो तो ‘कन्ट्रोल एन’ दबा के आप नया खेत तो बना नहीं सकते। अब, जब फसल कटेगी तब जा के खेत खाली होगा। तो इस बीच आप तो खाली हैं। क्या कीजियेगा इस खाली समय का जिसमें पैसा भी खर्च नहीं हो, आनन्द भी आये और खाली समय भी सटा-सट कट जाये। तो खोंचर कीजिये और क्या। अब रहे बाकि पैंतालिस प्रतिशत लोग। अब इसमें से जो सरकारी कर्मचारी हैं उनके पास खोंचर करने का स्कोप सबसे ज्यादा है। कहा जाता है कि सरकारी नौकरी मिलना जितना कठिन है, उससे भी कठिन है किसी को उससे निकलवा देना। तो चपरासी से लेकर प्रधान सचिव तक इस पारम्परिक और कभी न लुप्त होने वाली कला के रियाज में लगे रहते हैं। चपरासी बिलम्बित लय में खोंचर करेगा, बीच का कर्मचारी मध्य लय में ओर आला अधिकारी द्रुत लय में। फिर बचे प्राईवेट सेक्टरों में काम करने वाले। तो यहाँ पर वे बडे़ बदकिस्मत हैं क्युँकि उनके पास खोंचर करने का ज्यादा स्कोप है नहीं। वहाँ खोंचर सिर्फ मैनेजमेंट कर सकता है। तो ऐसे लोग सामान्यतः शादी-ब्याह, छठ्ठी-छिल्ला में इस कला का प्रदर्शन कर काम चलाते हैं। अब बचे अपना रोजगार करने वाले लोग। तो ये वास्तव में खोंचर की दुनिया के असली जादूगर हैं। अगर आप खोंचर करना नहीं जानते तो कभी अपना रोजगार-व्यापार नहीं बढ़ा सकते।
अब इसमें एक सबसे ऊपर क्रीमी लेयर टाईप का एक लेयर है जिनकी संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है लेकिन भारतवर्ष की मीडिया और सोशल मीडिया इन्हीं खोंचरिस्टों की वजह से इतनी अमीर हो रही है कि आज हर मौकापरस्त इसमें शामिल होना चाहता है। इस क्रीमी लेयर खोंचरिस्ट्स की लिस्ट में सेलेब्रिटीज भी हैं, राजनेता भी हैं, अभिनेता भी हैं, सोशलिस्ट भी हैं, मार्क्सिस्ट भी हैं, कम्यूनिस्ट भी हैं, स्वयंभू सन्त भी हैं, टोपी-दाढ़ी वाले बडे़ कद के मौलाना-मौलवी भी है, चंदन-टीका वाले बडे़-बडे़ पण्डित, महन्त और बाबा भी हैं। इनका किया हुआ एक खोंचर दो-तरफा कार्य करता है। किसी लॉबी को बहुत फायदा पहुँचता है और किसी लॉबी को बहुत नुकसान।
यहाँ तक कि खोंचर करने की इस कला को व्यवसाय में भी सफलतापूर्वक समाहित कर लिया गया है। अब सिंघम बाबू को अपनी कोई फिल्म पिटती दिखाई देयी तो एक लॉबी उसी टाइम में इस फिल्म के बारे में, प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इतना खोंचर करेगी कि लोग उस फिल्म के प्रति उत्सुक हो जायेंगे। बहुत लोगों को तो ये भी नहीं पता कि इधर कुछ नेता जो नये सरकार की कार्यवाहियों और उनके सम्बन्धित मन्त्रियों का खोंचर करने में लगे रहते हैं, वो दरअसल प्रायोजित खोंचरिस्ट हैं।
इसे मैनेजमेन्ट गुरूओं की भाषा में निगेटिव पब्लिसिटी कहते हैं। आप एक आदमी को सौ रूपया दीजिये और कहिये कि वो पूरे मुहल्ले में प्रचार कर दे कि कल सुबह आप अपनेे घर से बाहर डान्स करने वाले हैं। मैं भरत मुनि का नाम दे के आपको चैलेन्ज करता हूँ, कोई नहीं आयेगा। लेकिन अगर आप उस आदमी को सौ रूपये देने का बाद ये कहें कि वह मुहल्ले में प्रचार कर दे कि अगली सुबह आप अपने घर के बाहर कपड़ा-फाड़ डान्स करेंगे तो कसम भरत मुनि कि, आधा मुहल्ले आपके घर के  बाहर आ के जमा हो जायेगा।
तो ऐसा नहीं है कि खोंचर सिर्फ तकलीफ देने के लिये किया जाता है। कई बार इससे बहुत फायदा भी होता है। अरविन्द केजरीवाल एण्ड पार्टी ने कांग्रेस का इतना खोंचर किया कि भाजपा पूर्ण बहुमत में आ गई। केजरीवाल को भी पता है कि भारत का नागरिक भ्रष्टाचार पर भाषण सुनते समय एकदम से क्रान्तिवीर का नाना-पाटेकर हो जाता है लेकिन सभा स्थल से बाहर निकलते ही शूल फिल्म के सयाजी शिन्दे बनने में उसे एक मिनट भी देर नहीं लगती है और वह तो पी.एम. बनने से रहे। अब इससे हुआ यह कि केजरीवाल के सामने एक नया विकल्प प्रस्फुटित हो गया। अब वह भारतिय राजनीति के परम्यूटेशन-कॉम्बीनेशन में एक ऐसे फैक्टर हैं जो अपने खोंचर करने की अद्भुत कला से सरकार पलट सकते हैं। जब कुछ लोग कहते हैं कि केजरीवाल दरअसल भाजपा के तरफ से के.ओ.डी. अर्थात् खोंचरिस्ट औन स्पेशल ड्यूटी हैं तो मुझे आश्चर्य नहीं होता। इससे शानदार और किफायती टूल और क्या हो सकता है कि आप बस बोल के, खोंचर कर के पचास-साठ साल तक राज करने वाली पार्टी का इतना बुरा हाल कर सकते हैं। अरे भाई, अरविन्द केजरीवाल कोई पहले खोंचरिस्ट थोडे़ न हैं। इसके पहले भी कई खोंचरिस्ट आये, फिर भी सरकार तो राज कर ही रही थी। वास्तव में यह उनका सेल्फ डेवेलप्ड टैलेन्ट है जिसे उन्होंने बडे़ प्यार से, बड़ी मेहनत से तराशा है।
तो यह सब लवेद उनके बारे में हुआ जिनके ग्रे-मैटर में खोंचर के कीटाणुओं की संख्या एक खास न्युनतम मात्रा से अधिक होती है। लेकिन जिनके ग्रे-मैटर में इसके कीटाणुओं की संख्या एक खास न्युनतम मात्रा से कम होती है उनका क्या? माना कि ऐस लोगों में लक्षण प्रकट नहीं होते तो ये सिद्यांत तो गलत हो जायेगा कि हर आदमी में खांेचर करने की अनिवार्य योग्यता होती है और योग्यता बिना परिणाम दिखाये सिद्ध नहीं की जा सकती है। आपने अपने घरों में, खेतों में, खलिहान में, गोदामों में, रेलवे स्टेशन की पटरियों पर, किराने की दुकानों में, होटलों में, ढ़ाबों में दो तरह के चूहे देखे होंगे। एक छोटा वाला जो खाता कम है सामान ज्यादा काटता है। और एक बड़ा वाला जो खाली खाने के फेर में रहता है और काटम-कुट्टम तभी करता है जब अनाज के डब्बे में घुसने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा हो। ये बड़ा वाला चूहा वही चूहा है जिसको ‘‘खाने में गलत क्या है, हम भी खाते थे’’ बोल कर बिहार के वर्तमान मुख्यमन्त्री हाल-फिलहाल विवादों के घेरे में आ गये थे। हम अभी छोटे वाले चूहे के काटम-कुट्टम वाली खतरनाक आदत की समीक्षा करेंगे।
दरअसल चूहे के आगे वाले दाँतों को ईश्वर ने बढ़ते रहने का श्राप दिया है जिसे ‘इनसीजर’ कहते हैं। चुहों के ये दाँत उसी तरह बढ़ते हैं जैसे हमारे नाखून तो चूहे उन दाँतों की लम्बाई को न बढ़ने देने के लिये उन्हें घिसते रहते हैं। एक तरह से फाईलिंग करते हैं जैसे लड़कियाँ अपने नाखुनों को निश्चित आकार में और लम्बाई में बनाये रखने के लिये फाईलिंग करती है। अब इन्सान के पास तो तरह-तरह का औजार है लेकिन चूहा बेचारा क्या करे। वह सामान कुतरता रहता है ताकि दाँत की घिसाई हो सके। अगर ऐसा नहीं करेगा तो कुछ महीनों में उसके आगे वाले दाँत इतने लम्बे हो जायेंगे कि उसे दो पैर पर चलना पडे़गा और अगर चूहा दो पैर पर चलने लगेगा तो विकास की सीढ़ी पर वेटिंग लिस्ट में खडे़ बन्दर तो शर्म से मर ही जायेंगे और साथ ही साथ डार्विन और लैमार्क के सिद्धान्तों की बखिया उधड़ जायेगी। अब चूहा ठहरा श्री गणेश की सवारी। तो ऐसा होना उसे भी अच्छा नहीं लगेगा। इसलिये वह सामानों को कुतर-कुतर कर दाँत घिसता रहता है।
अब जो मैं कहना चाह रहा हूँ उसका आधार मेरा अनुभव है और मानव शरीर विज्ञान के जानकार इससे बिल्कुल सहमत नहीं होगें। अब ना होगें, तो न हों। हैदराबादी बिरयानी मैं हैदराबाद ढूँढिये, नहीं मिलेगा। कश्मीरी पुलाव में कश्मीर ढूँढि़ये नहीं मिलेगा। उसी तरह इन्सान के दिमाग में हमेशा बढ़ते रहने वाले दाँत भी होते हैं, शरीर विज्ञान के विशेषज्ञ ढूँढेगे, कभी नहीं मिलेगा। और इन्सान के दिमाग के यही दाँत खोंचर करने के काम आते हैं। चुँकि ये बढ़ते रहते हैं इसलिये इन्हें चूहे की तरह घिसते रहना परम आवश्यक है। दिमाग के इन दाँतों से बातों, सिद्धान्तों, फलसफों, तर्को, विचारों, भावनाओं और उपदेशों को कुतरा जाता है। यही प्रक्रिया खोंचर करना कहलाती है। अब जो दूसरे की बातों और सिद्धान्तों को खोंचर करते रहते हैं उनके दिमाग के भीतर उगे खोंचर करने वाले ये दाँत बाहर की तरफ बढ़ते हैं और ऐसे लोगों में खोंचर करने वाले कीटाणुओं की संख्या थ्रेशहोल्ड अमाउन्ट से ज्यादा होती है। लेकिन जिस किसी भी इन्सान में इन कीटाणुओं की संख्या थ्रेशहोल्ड अॅमाउन्ट से कम होती है उनके दिमागों में ये दाँत भीतर की तरफ मुडे़ होते हैं और वे भीतर की तरफ ही बढ़ते हैं। ऐसे लोग दुसरों का खोंचर नहीं कर पाते और एकान्त में अपने को ही खोंचर करते रहते हैं। दार्शनिक, चिन्तक, कवि, लेखक माइग्रेन और रक्तचाप के मरीज इसी श्रेणी में आते हैं।
यहाँ तक कि इन्सान की पहली कलात्मक अभिव्यक्ति खोंचर के रूप में शुरू हुई थी जब उसने गुफाओं के दीवारों पर खरोंच मार-मार कर तरह-तरह का चित्र बनाना शुरू किया था। अन्दर दबी मानसिक ऊर्जा को जब निकास नहीं मिलता तब यह ऊर्जा मनुष्य को उद्वेलित करती है। तब मनुष्य इसे सृजन और रचनात्मक अभिव्यक्तियों में खर्च करता है ताकि यह ऊर्जा बाहर निकल सके। गायन, वादन, लेखन, चित्रकारी, मुर्तिकारी, कढ़ाई, बुनाई, शिल्पकारी और भी न जाने कितने कलात्मक कार्य हैं जिसके द्वारा आप अपनी मानसिक उर्जा को सृजन के क्रम में बाहर निकालते हैं। इन सारे कार्यों में एक खास बात यह है कि जितनी मानसिक उर्जा खर्च होती है उससे दुगुनी फिर से बन भी जाती है जबकि खोंचर एक ऐसा कार्य है जिसमें मानसिक उर्जा का केवल निकास होता है।
सन्सार में कोई ऐसा काम नहीं है जिसमें खोंचर नहीं किया गया हो। यह एक वैश्विक प्रक्रिया है। खुद अमेरिका के पास परमाणु बम है लेकिन अगर भारत जैसे देश इसे अपने पास रखना चाहेंगे तो वो खोंचर करेगा। चीन भी खांेचर करेगा, जापान भी करेगा। जर्मनी, इटली, फ्रांस, सब खोंचर करेंगे। ऐलोपैथ का डॉक्टर हेम्योपैथी और आयुर्वेद को खोंचर करेगा। मूल तौर पर मैं यहाँ इस लेख में कर क्या रहा हूँ ? जी हाँ, बिल्कुल सही समझे आपलोग। मैं खोंचर कर रहा हूँ, और क्या। तो, सौ बात की एक बात- ‘‘खोंचर कीजिये, सुख से रहिये!’’
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
8 जनवरी 2015
पटना

Wednesday, December 31, 2014

"ये बात और है - कि शायद कुछ भी नहीं"


नया क्या होने वाला है ?
शायद कुछ भी नहीं,
जो ये दुआ कर रहे थे
कि जल्दी से चली जाए ये ठंड
और मिल जाए ये सोचने का बहाना
कि ज़िंदगी काट जाती है
कम्बल और अलाव के बिना,
उनको फ़र्क पड़ा क्या।


नया क्या होने वाला है ?
शायद कुछ भी नहीं,
कि मोहल्ले में
एके दबंग युवक बीच रास्ते में
अपनी गाड़ी रोक कर
सबको दे रहा था गालियाँ
और शराब से ज़्यादा ताकत के नशे में चूर
बगल से गुजरते हुए हर आम इन्सान को
ज़िंदा होते हुए भी
अपने को मृत और
शरीर में पांच लीटर लहू,
दो हाथ, दो पाँव
और एक दिमाग़ होते हुए भी
अपने को अनाकृत मान लेने का
अभ्यास करा रहा था।
जो लोग मौन थे
वो उसकी जाति के थे
जो लोग मज़ा ले रहे थे
उनकी कोई जात नहीं थी
और जो लोग गालियाँ सुन कर भी
परिवार के बारे में सोच कर बढ़ जा रहे थे
वो किसी भी जाति के हों
चाहे कायस्थ, भूमिहार, राजपूत,
ब्राह्मण, यादव, बनिया, धानुक, कुर्मी
दुसाध, डोम, चमार या कुछ और
ग़ाली सुनते समय एक ही जाती के थे।
नया क्या होने वाला है ?
शायद कुछ भी नहीं,


क्या ये नया था
कि इस शाम हम
पिछले साल से महंगी शराब पीने वाले थे?
या ये नया था कि
कैलेंडर के कुछ अंक बदल जाने वाले थे ?
या फिर ये नया था
कि "भूल जाओ ये छोटी मोटी बात"
कहने वाले कुछ और नए मित्र बनने वाले थे ?
या शायद ये नया था
कि ऐसी सूअर से बिना लड़े
घर लौट आने कि कला पर
पिता से शाबासी मिलने वाली थी।  


नया क्या होने वाला है ?
शायद कुछ भी नहीं,
कि पार्टी में नृत्य हो रहा था
लेकिन एक नृत्य मेरे जेहन में हो रहा था
कि आख़िर आज बारह बजे के बाद
नया क्या हो जाएगा,
पार्टी में खाना हो रहा था
और एक सवाल मुझे खा रहा था
कि सही होते हुए भी
हार मान लेना या बच के निकल जाना
कला क्यूँ  हो गया है,
पार्टी में सिगरेट सुलग रही थी
और मेरा अन्तर्मन
इस बात पर सुलग रहा था
कि भीड़ या तो बेबस या एकदम उन्मादी
क्यूँ होती है।


नया क्या होने वाला है ?
शायद कुछ भी नहीं,
मैं पहले  कवितायेँ लिखता था
आज भी लिख रहा हूँ,
मैं पहले भी बिखरता रहा था
आज भी बिखर रहा हूँ,
मैं पहले भी कहता रहा था
कि हथियार और असलहे से
तस्वीर नहीं बनती, बस तारीख़ बनती है,
ये आज भी कह रहा हूँ।


चूँकि सभी कह रहे थे
तो मैंने भी सोचा कि
कुछ नया होने वाला है,
ये बात और है -
कि शायद कुछ भी नहीं।

''निर्मल अगस्त्य''

Tuesday, November 25, 2014

‘‘राम बनना है तो इनव्हेस्ट कर!’’


न को भी एजेन्टस् की आवश्यकता नहीं है। कोई उसका एजेन्ट बन भी नहीं सकता।
तुम्हारी एजेन्सी की लुटिया डूबो देगा ये कम्बख़्त मन। यह तुम्हारे अन्दर होकर भी तुम्हारी पहुँच से बाहर है।
इस पर विवेचना करोगे तो तुम स्वाद से बिछड़ जाओगे। चाहे वह सन्देश हो या किसी का रूप।
गुरू कहते रहे- ‘‘विवेक मन की लगाम है।’’
लो... पकड़ो !!!
अब कसते रहो लगाम...!
गोया तुम्हारा जन्म ही हुआ है लगाम कसने और नाल ठोंकने के लिये। सभी जानते हैं कि राम एक ही थे जो कभी मर्यादापुरूषोत्तम बन कर पृथ्वी पर अवतरित हुये थे। गुरूओं को आभास है कि राम दुबारा नहीं आने वाले अतः उन्होंने राम बनाने का ठेका ले रखा है। उन्होंने कारखाने डाल रखे हैं, उनके वर्कशॉप में पर-वचन निरन्तर चल रहा है। पर-वचन...! जो ज्ञान दूसरों के लिये है। अपने लिये सुरा है, सुन्दरी है, मेवा है, कलेजी है।
अब उनको आभास है कि राम तो आयेगा नहीं तो क्रॉस व्हेरीफि़केशन का झंझट तो है ही नहीं। तीन महीने की एक्सटेन्सिव ट्रेनिंग और आधी जमापूंजी ख़र्च करने के बाद तुम्हारा सतर्क दिमाग़
ख़ुद ही बोल पड़ेगा कि अब कौन सी तुम्हारी सीता का हरण होने वाला है, और तुम्हारा बाप भी किसी कैकयी के फेर में नहीं पड़ने वाला। एक कौशल्या को सम्भालने में उसका पूरा शरीर टिस-टिस करता रहता है। आर्थराइटिस, स्पॉन्ड्लाइटिस, गैस्ट्राईटिस और भी न जाने कौन-कौन सा ‘टिस’।
दिमाग़, बही खाते को देखकर कहेगा- चलो बहुत हुआ... हो गये तुम राम... समझ गये मन को पकड़ने का गुर...। गुरू को प्रणाम खींच और चुपचाप निकल ले वरना प्रमोशन और इन्क्रीमेन्ट की गाड़ी पकड़ने की कला भूल जाओगे। तुम भी गदगद होकर सोचोगे- हाँ भई, कोई मशीन थोड़े ना बना है यह नापने के लिये कि तुमने मन को पकड़ के रखा है या नहीं या पकड़ कर रखा है तो कहाँ रखा है। तीस से चालीस लाख ख़र्च कर के जब डिप्टी कलक्टर बना जा सकता है तो किसी आश्रम में डेढ़ करोड़ खर्च कर के राम तो शर्तिया बना जा सकता है।
प्रोडक्ट मैनेजर बने रहना तो इन्सान का पहला धर्म है। इतना मँहगा प्रोडक्ट भला ख़राब होता है क्या। लो जी... तुम मन को जीत गये। राम बन गये। जाओ आज छुट्टी।
अभी-अभी ‘इन्सेपशन’ रीलिज़ हुई है। जा के देख आओ। तुम त्रेता युग के राम से ज्यादा धनी हो।
तुम दीक्षा सम्पन्न होने के उपरान्त ‘अवतार’ और और ‘इन्सेप्शन’ भी देख सकते हो। सीता घर में भाड़ झोंक रही है। तुम चौपाटी पर अपनी सेकेटरी के साथ रोमान्स कर सकते हो।
तुम राम से ज्यादा क्वालीफ़ायड हो। तुम्हारा रिज़्यूमे राम से ज्यादा तगड़ा है। तुम्हारी डिग्री ऑक्सफ़ोर्ड से मान्यता प्राप्त है। बेचारे राम क्या, उनके बाप दशरथ ने भी ऑक्सफ़ोर्ड का नाम नहीं सुना होगा।
तो इतनी मँहगी प्रक्रिया से गुज़रनी पड़ती है मन को पकड़ पाने के लिये। जितनी तेज़ी से पैसे ख़र्च होंगे उतनी ही तेज़ी से तुम सीखते जाओगे। नहीं भी सीखोगे तो तुम मान लोगे कि तुम सीख रहे हो।
कोई तुम्हारे सर पर हाथ रखकर कहे- तुम्हारे अन्दर बुद्ध छिपा बैठा है। तुम बुद्ध हो।
तुम उसे पागल समझ कर भगा दोगे, जबकि ऐसा बिल्कुल सम्भव है कि तुम वाकई बुद्ध का ही अवतार हो। बुद्ध को भी तुम्हारी तरह राजयोग मिला था। पर तुमने अभी इनव्हेस्ट नहीं किया इसलिये तुम अपने अन्दर के प्रोडक्ट की कीमत नहीं समझ रहे हो।
अगर तुम्हारी बीबी तुम्हारे नौकर के साथ भाग जाये, तुम्हारा बेटा बलात्कार कर फाँसी चढ़ जाये और तुम्हारा नौकर तुम्हारा सब कुछ हड़प ले और तब वही आदमी तुम्हारे सर पर हाथ रखकर तुम से कहे कि तुम बुद्ध हो, तुम्हारे अन्दर बुद्ध का अंश है तो तुम तत्क्षण उसे बोधि वृक्ष मान कर उसके कदमों में लम्बलेट हो जाओगे और कहोगे- ‘‘तुम अब कहाँ थे गुरू।’’
गुरू कहीं नहीं था। वो तो बस तुम्हारे इनव्हेस्टमेन्ट का इन्तज़ार कर रहा था। तुमने बीबी इनव्हेस्ट कर दी, तुमने बेटा इनव्हेस्ट कर दिया, तुमने प्रापर्टी इनव्हेस्ट कर दी, उसने तुम्हें बुद्ध बना दिया। तुम्हें समझा दिया कि तुम मन को पकड़ने का सार जान गये हो। जाओ-इस सर्टिफि़केट को अच्छी तरह मढ़वा कर अपने गले में टाँग लो। अभी तुम्हारे आगे-पीछे चेलों की भीड़ लगने वाली है इसलिये इसकेे पहले पास के मल्टीप्लेक्स में लगी ‘इन्सेप्शन’ देखकर घर जाना। सपने में सपना, सपने में सपना का मज़ा ले के जाना।
ये सुविधा राम को नसीब नहीं थी भाई और ‘इन्सेप्शन’ जैसी फि़ल्म दस रूपये की सी.डी. पर कभी समझ में नहीं आयेगी तुझे। चार सौ रूपये का टिकट ले, तब तू मुहल्ले में जा के कह सकेेगा कि तुझे ‘इन्सेप्शन’ समझ में आ गई है।
लोग पूछेंगे- ‘‘काहे का ‘इन्सेप्शन’? कहीं यह ‘कोन्ट्रासेप्शन’ की बड़ी बहन तो नहीं है?’’ तुम कहोगे- ‘‘नहीं यारों, ‘इन्सेप्शन’... ‘इन्सेप्शन’... माने... मल्टीप्लेक्स वाली ‘इन्सेप्शन’...’’
लोग कहेंगे- ‘‘धत्त तेरे की! ऐसा बोल ना कि ‘इन्सेप्शन’... देखा।’’ मल्टीप्लेक्स सुनते ही वे लोग भी समझ जायेंगे तू किस ‘इन्सेप्शन’ की बात कर रहा है और तू तो चार सौ का टिकट कटाते ही समझ गया होगा- ‘इन्सेप्शन’...!
‘इन्सेप्शन’...! माने ‘इन्सेप्शन’...! और क्या!
‘‘निर्मल अगस्त्य’’
‘उपन्यास अंश’ ‘‘बस एक तीली’’ से
तुम्हारी एजेन्सी की लुटिया डूबो देगा ये कम्बख़्त मन। यह तुम्हारे अन्दर होकर भी तुम्हारी पहुँच से बाहर है।इस पर विवेचना करोगे तो तुम स्वाद से बिछड़ जाओगे। चाहे वह सन्देश हो या किसी का रूप। गुरू कहते रहे- ‘‘विवेक मन की लगाम है।’’लो... पकड़ो !!!अब कसते रहो लगाम...!गोया तुम्हारा जन्म ही हुआ है लगाम कसने और नाल ठोंकने के लिये। सभी जानते हैं कि राम एक ही थे जो कभी मर्यादापुरूषोत्तम बन कर पृथ्वी पर अवतरित हुये थे। गुरूओं को आभास है कि राम दुबारा नहीं आने वाले अतः उन्होंने राम बनाने का ठेका ले रखा है। उन्होंने कारखाने डाल रखे हैं, उनके वर्कशॉप में पर-वचन निरन्तर चल रहा है। पर-वचन...! जो ज्ञान दूसरों के लिये है। अपने लिये सुरा है, सुन्दरी है, मेवा है, कलेजी है।अब उनको आभास है कि राम तो आयेगा नहीं तो क्रॉस व्हेरीफि़केशन का झंझट तो है ही नहीं। तीन महीने की एक्सटेन्सिव ट्रेनिंग और आधी जमापूंजी ख़र्च करने के बाद तुम्हारा सतर्क दिमाग़ख़ुद ही बोल पड़ेगा कि अब कौन सी तुम्हारी सीता का हरण होने वाला है, और तुम्हारा बाप भी किसी कैकयी के फेर में नहीं पड़ने वाला। एक कौशल्या को सम्भालने में उसका पूरा शरीर टिस-टिस करता रहता है। आर्थराइटिस, स्पॉन्ड्लाइटिस, गैस्ट्राईटिस और भी न जाने कौन-कौन सा ‘टिस’।दिमाग़, बही खाते को देखकर कहेगा- चलो बहुत हुआ... हो गये तुम राम... समझ गये मन को पकड़ने का गुर...। गुरू को प्रणाम खींच और चुपचाप निकल ले वरना प्रमोशन और इन्क्रीमेन्ट की गाड़ी पकड़ने की कला भूल जाओगे। तुम भी गदगद होकर सोचोगे- हाँ भई, कोई मशीन थोड़े ना बना है यह नापने के लिये कि तुमने मन को पकड़ के रखा है या नहीं या पकड़ कर रखा है तो कहाँ रखा है। तीस से चालीस लाख ख़र्च कर के जब डिप्टी कलक्टर बना जा सकता है तो किसी आश्रम में डेढ़ करोड़ खर्च कर के राम तो शर्तिया बना जा सकता है। प्रोडक्ट मैनेजर बने रहना तो इन्सान का पहला धर्म है। इतना मँहगा प्रोडक्ट भला ख़राब होता है क्या। लो जी... तुम मन को जीत गये। राम बन गये। जाओ आज छुट्टी।अभी-अभी ‘इन्सेपशन’ रीलिज़ हुई है। जा के देख आओ। तुम त्रेता युग के राम से ज्यादा धनी हो।तुम दीक्षा सम्पन्न होने के उपरान्त ‘अवतार’ और और ‘इन्सेप्शन’ भी देख सकते हो। सीता घर में भाड़ झोंक रही है। तुम चौपाटी पर अपनी सेकेटरी के साथ रोमान्स कर सकते हो।तुम राम से ज्यादा क्वालीफ़ायड हो। तुम्हारा रिज़्यूमे राम से ज्यादा तगड़ा है। तुम्हारी डिग्री ऑक्सफ़ोर्ड से मान्यता प्राप्त है। बेचारे राम क्या, उनके बाप दशरथ ने भी ऑक्सफ़ोर्ड का नाम नहीं सुना होगा।तो इतनी मँहगी प्रक्रिया से गुज़रनी पड़ती है मन को पकड़ पाने के लिये। जितनी तेज़ी से पैसे ख़र्च होंगे उतनी ही तेज़ी से तुम सीखते जाओगे। नहीं भी सीखोगे तो तुम मान लोगे कि तुम सीख रहे हो।कोई तुम्हारे सर पर हाथ रखकर कहे- तुम्हारे अन्दर बुद्ध छिपा बैठा है। तुम बुद्ध हो।तुम उसे पागल समझ कर भगा दोगे, जबकि ऐसा बिल्कुल सम्भव है कि तुम वाकई बुद्ध का ही अवतार हो। बुद्ध को भी तुम्हारी तरह राजयोग मिला था। पर तुमने अभी इनव्हेस्ट नहीं किया इसलिये तुम अपने अन्दर के प्रोडक्ट की कीमत नहीं समझ रहे हो।अगर तुम्हारी बीबी तुम्हारे नौकर के साथ भाग जाये, तुम्हारा बेटा बलात्कार कर फाँसी चढ़ जाये और तुम्हारा नौकर तुम्हारा सब कुछ हड़प ले और तब वही आदमी तुम्हारे सर पर हाथ रखकर तुम से कहे कि तुम बुद्ध हो, तुम्हारे अन्दर बुद्ध का अंश है तो तुम तत्क्षण उसे बोधि वृक्ष मान कर उसके कदमों में लम्बलेट हो जाओगे और कहोगे- ‘‘तुम अब कहाँ थे गुरू।’’गुरू कहीं नहीं था। वो तो बस तुम्हारे इनव्हेस्टमेन्ट का इन्तज़ार कर रहा था। तुमने बीबी इनव्हेस्ट कर दी, तुमने बेटा इनव्हेस्ट कर दिया, तुमने प्रापर्टी इनव्हेस्ट कर दी, उसने तुम्हें बुद्ध बना दिया। तुम्हें समझा दिया कि तुम मन को पकड़ने का सार जान गये हो। जाओ-इस सर्टिफि़केट को अच्छी तरह मढ़वा कर अपने गले में टाँग लो। अभी तुम्हारे आगे-पीछे चेलों की भीड़ लगने वाली है इसलिये इसकेे पहले पास के मल्टीप्लेक्स में लगी ‘इन्सेप्शन’ देखकर घर जाना। सपने में सपना, सपने में सपना का मज़ा ले के जाना।ये सुविधा राम को नसीब नहीं थी भाई और ‘इन्सेप्शन’ जैसी फि़ल्म दस रूपये की सी.डी. पर कभी समझ में नहीं आयेगी तुझे। चार सौ रूपये का टिकट ले, तब तू मुहल्ले में जा के कह सकेेगा कि तुझे ‘इन्सेप्शन’ समझ में आ गई है।लोग पूछेंगे- ‘‘काहे का ‘इन्सेप्शन’? कहीं यह ‘कोन्ट्रासेप्शन’ की बड़ी बहन तो नहीं है?’’ तुम कहोगे- ‘‘नहीं यारों, ‘इन्सेप्शन’... ‘इन्सेप्शन’... माने... मल्टीप्लेक्स वाली ‘इन्सेप्शन’...’’ लोग कहेंगे- ‘‘धत्त तेरे की! ऐसा बोल ना कि ‘इन्सेप्शन’... देखा।’’ मल्टीप्लेक्स सुनते ही वे लोग भी समझ जायेंगे तू किस ‘इन्सेप्शन’ की बात कर रहा है और तू तो चार सौ का टिकट कटाते ही समझ गया होगा- ‘इन्सेप्शन’...!‘इन्सेप्शन’...! माने ‘इन्सेप्शन’...! और क्या!‘‘निर्मल अगस्त्य’’‘उपन्यास अंश’ ‘‘बस एक तीली’’ से

Wednesday, November 19, 2014

क्रियेटिविटि का फेर में मत पड...!


मन की हजार बाँहें है और वो निरंतर व्यस्त है-
-समेटने में!
मन, संग्रह की सीमा से परे जा सकता है। मन, विघटन में सौंदर्य तलाशता रहता है। अतः वह समेटता ही रहता है-
-अपनी हजार बाँहों से।
मन की सत्ता है, किसी सौफ्टवेयर की तरह... जो दिखता तो नहीं परन्तु सबसे विस्तृत मात्रा में अंत्यावलोकित हो सकता है।
मन को बहने दो...उड़ने दो...विवेक की बातें मत करो। 

मन, लेक्चर का विषय नहीं है। मन, अनुभूति का विषय है। इसकी सौर्टिंग मत करने लग जाओ कि इसने किस पल में क्या समेटा, तुम थक जाओगे। सौर्टिंग करना दिमाग का काम है।
सायलेंट वैली, समझो मन है। मारियाना ट्रेंच में सम्पन्न होता इकोसिस्टम मन है। लेकिन ये बस शुरूआती समझ के लिए मन है।
दिमाग तो राॅक गार्डेन है, ट्विन सीटी है, माॅल है, अक्वेरियम है। दिमाग को उसका काम करने दो। उसे सौर्टिंग करने के लिये ही बनाया गया है।
बस ऐसे ही या बस यूँ ही! अकारण तो कुछ भी नहीं, यह दर्शनशास्त्र और तर्कशास्त्र से लेकर विज्ञान और पराविज्ञान, सभी जगह विश्लेषित है।
लेकिन, बस यूँ ही... बस ऐसे ही... एक अद्भुत दर्शन है। इसके लिये किसी वायिज की जरूरत नहीं है।
मन भी... बस यूँ ही है, ऐसे ही है।
ग्यारहवीं कक्षा में शम्भू बेबस मन से सोचता रहा कि उसने विज्ञान क्यूँ ले लिया। एक तो विज्ञान उसके लिये कठिन था और दूसरी उसकी रूचि अध्यात्म में ज्यादा थी।
उस दिन शम्भु बडा खुश था जब उसके पिता ने कहा- ‘‘सब्जेक्ट बदल ले... तुझे जो रूचि है, वही पढ़ ... अच्छे मार्क्स ला और किसी विश्वविद्यालय का प्रोफेसर बन।’’

उसके पिता जी ने सौर्टिंग करने में उसकी मदद की और एक दिन वह शम्भू से प्रोफेसर शम्भूनाथ बन गया। उसके अध्यात्म के दिये में तेल अब भी था परन्तु एक बार भी दियासलाई जलाने का प्रयत्न ना तो शम्भू ने किया और ना ही शम्भू के पिताजी ने।
अध्यात्म एक ट्विस्टेड पहेली की तरह है और हर विषय में है। यह पंक्ति दियासलाई की एक जलती तीली की तरह है जो उसे कोई नहीं कह सका।
अगर वह हेजेनबर्ग की अनसरटॅनिटि प्रिंसिपल को मन से जोड कर देखता तो शायद विज्ञान उसका सबसे पसन्दीदा विषय होता।
इसमें शम्भू का ज्यादा दोष नहीं था। ऐसे लाखों शम्भू  है यहाँ  जिनके उपर पे-स्केल, पद और गरिमा का तंबू फैला हुआ है।
पिताओं और शिक्षकों ने सौर्टिंग कर रखी है... बिल्कुल किसी बही-खाते की तरह। आसमान को उन्होंने लाइब्लिटी साइड में रखा है। आसमान के बारे में सोचना लाइब्लिटी है। पद के बारे में सोचना असेट है।
मेरे दो दोस्त हेमन्त और राजीव... प्रतिभावान युवक हैं और हमेशा, कम से कम दिन में दो बार जरूर कहते हैं-
‘‘वी आॅर कम्प्लीट्ली सार्टेड दैट यूनिवर्स इज एन इल्युजन’’
यह केसी सौर्टिंग है?
एक तरफ वे कहते है कि ब्रह्मांड एक मरीचिका है और दुसरी तरफ वे कहते है दे आॅर कम्प्लीट्ली सार्टेड। इल्युजन अध्यात्म का विषय है और सौर्टिंग...?
उन दोनों के दिये में तेल है और वे उसे जलाने की बजाय वे उसपर पानी डाल रहे हैं। वैसे ये दिखता बडा अच्छा हैै। तेल और पानी का खेल।
‘‘निर्मल खडा बाजार में, बाँच रहा एक तेल
तेल से जिसका मेल नहीं है, पानी से जिसका मेल।’’
जब तेल पानी पर तैरता है तब तक ये विज्ञान है... और जब पानी तेल पर तैरे तो यह परा-विज्ञान है। ये बस प्वांयट आॅफ रेफरेंस की बात है... आप देखते किधर से हैं।
गुरूत्वाकर्षण शक्ति वाले हर पिंड में उपर... अर्थात अवे फ्राम ग्रेविटि... गुरूत्व से दूर... और नीचे... मतलब, टुवार्ड्स ग्रेविटि...मतलब गुरूत्व की तरफ...
लो जी, सौर्टिंग तो पहले से की हुई है। तुम पानी को तेल के उपर इस आयाम में तो नहीं तैरा सकते...।
सार्टेड वातावरण में मन का प्रवाह नहीं देखा जा सकता। जाओ प्रोफेसर बनो... युनिवर्सिटिज तुम्हें बुला रही है।
मन को ताला नहीं लगाया जाता। ताला लगाया जाता है मन्दिर में... मुर्तियों को रखा जाता है ताले में...।
एक युवक हनुमान जी की मुर्ति के सामने आँखें बंद कर बुदबुदा रहा है... दिमाग ने पहले ही सौर्टिंग कर रखी है...
नौकरी, फिर प्रेमिका... तभी दिल बीच में बोल बैठा....पहले प्रेमिका!
लो जी अन्तद्र्वन्द शुरू हो गया... बुदबुदाहट और तेज हो गई...
जैसे-तैसे उसकी प्रार्थना खत्म हुई और जैसे ही वह मुडने को हुआ, पन्डित ने उस आवाज दी...
‘‘आरती ले लो बच्चा...’’
उसने कहा...‘‘जी’’... और वह जेब टटोलने लगा...।
दिमाग ने कहा... पन्डित तो बडा स्याना है... एक रूपया ले कर ही मानेगा...
दिल ने कहा... अब इस एक रूपये में पन्डित कौन सा कोई अटरिया काढ लेगा। अन्तद्र्वन्द फिर शुरू है और अंगुलियाँ जेब में पडे सिक्के को नाप-जोख रही हैं।
दिल कह रहा है... जल्दी से कोई भी निकाल... आरती ले और चलता बन। दिमाग कह रहा है... ऐसे उपापोह में ससुरा पाँच का सिक्का सबसे पहले निकल आता है।
जरा नाप के निकाल...। पन्डित का काम ही है तुम्हारे अंदर के इन्स्टीच्यूश्नलाइज्ड धर्म को घसीट कर बाहर निकालना...।
युवक के मंदिर में घुसने से लेकर आरती लेकर निकलने तक मन कहीं उपस्थित नही था... वह साक्षी भाव से स्वंय को देख रहा था।
कोई जरूरी नहीं कि मन हमेशा कुछ न कुछ करता रहे... वो तो बस चुंकि यूँ ही है... ऐसे ही है।
इसलिये वह बिना प्रयत्न के निष्क्रिय अवस्था में जाने की क्षमता भी रखता है...
मन विलिन अवस्था तक जा सकता है और उसे किसी योग या ध्यान की आवश्यकता नहीं है...।
युनिवर्सिटीज की पुकार अगर तुम्हारे उपर असर कर रही है... अनसार्टेड जीवन शैली तुम्हें खुरेच रही है... मन्दिर का पन्डित तुम्हें डरा रहा है... सिक्के जेब में पडे-पडे यायावरी कर रहे है...
तो प्रोफेसर शम्भूनाथ का अनुकरण कर। वैसे अभी वह लेक्चरर ही है लेकिन दुनिया उसे प्रोफेसर साहब कहने लगी है। तेरे पिताजी ने भी तेरे लिये तम्बु गाडा है... और वैसे भी अगर सिर्फ सलाह बाँचने की बात हो तो एक कप चाय... एक खिल्ली पान... और दो शब्द पाँय लागूँ के विनिमय पर कोई भी कुछ देर के लिये तुम्हारा पिता बनने को तैयार हो जायेगा...।
जरा इन्व्हेस्ट कर... जरा नजर दौडा... जरा पान दुकान तक टहल आ... मन के विस्तार के फेर में न माया मिलेगी न राम...।
युनिवर्सिटीज की पुकार पर ध्यान दे... युनिवर्सिटिज तुम्हारे लिये व्यग्र हैं...तुम सौर्टिंग अच्छा करते हो...मन, स्वप्न, अध्यात्म, अन्तरात्मा और क्रियेटिविटि के चक्कर में मत पड।जा..., युनिवर्सिटिज तुम्हें बुलाती हैं।
                                                                             ‘‘निर्मल अगस्त्य’’
                              ‘उपन्यास अंश’ ‘‘बस एक तीली’’ से